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Rigveda Mandal 1 / Sukta 31 / Mantra 18

191 Sukta
18 Mantra
1/31/18
Devata- अग्निः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒तेना॑ग्ने॒ ब्रह्म॑णा वावृधस्व॒ शक्ती॑ वा॒ यत्ते॑ चकृ॒मा वि॒दा वा॑। उ॒त प्र णे॑ष्य॒भि वस्यो॑ अ॒स्मान्त्सं नः॑ सृज सुम॒त्या वाज॑वत्या ॥

ए॒तेन॑ । अ॒ग्ने॒ । ब्रह्म॑णा । व॒वृ॒ध॒स्व॒ । शक्ती॑ । वा॒ । यत् । ते॒ । च॒कृ॒म । वि॒दा । वा॒ । उ॒त । प्र । ने॒षि॒ । अ॒भि । वस्यः॑ । अ॒स्मान् । सम् । नः॒ । सृ॒ज॒ । सु॒ऽम॒त्या । वाज॑ऽवत्या ॥

Mantra without Swara
एतेनाग्ने ब्रह्मणा वावृधस्व शक्ती वा यत्ते चकृमा विदा वा। उत प्र णेष्यभि वस्यो अस्मान्त्सं नः सृज सुमत्या वाजवत्या ॥

एतेन। अग्ने। ब्रह्मणा। वावृधस्व। शक्ती। वा। यत्। ते। चकृम। विदा। वा। उत। प्र। नेषि। अभि। वस्यः। अस्मान्। सम्। नः। सृज। सुऽमत्या। वाजऽवत्या ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 35 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) सर्वोत्कृष्ट विद्वन् ! आप (ब्रह्मणा) वेदविद्या (वाजवत्या) उत्तम अन्न युद्ध और विज्ञान वा (सुमत्या) श्रेष्ठ विचारयुक्त से (नः) हमारे लिये (वस्यः) अत्यन्त धन (अभिसृज) सब प्रकार से प्रगट कीजिये (उत) और आप (विदा) अपने उत्तम ज्ञान से (वावृधस्व) नित्य-नित्य उन्नति को प्राप्त हूजिये (ते) आपका (यत्) जो प्रेम है, वह हम लोग (चकृम) करें और आप (अस्मान्) हम लोगों को (प्रणेषि) श्रेष्ठ बोध को प्राप्त कीजिये ॥ १८ ॥
Essence
जो मनुष्य वेद की रीति से धर्मयुक्त व्यवहार को करते हैं, वे ज्ञानवान् और श्रेष्ठमतिवाले होकर उत्तम विद्वान् की सेवा करते हैं, वह उनको श्रेष्ठ सामर्थ्य और उत्तम विद्या से संयुक्त करता है ॥ १८ ॥ इस सूक्त में सभा, सेनापति आदि के अनुयोगी अर्थों के प्रकाश से पिछले सूक्त के साथ इस सूक्त की सङ्गति जाननी चाहिये।
Subject
फिर वह कैसा हो, इसका प्रकाश अगले मन्त्र में किया है ॥