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Rigveda Mandal 1 / Sukta 31 / Mantra 15

191 Sukta
18 Mantra
1/31/15
Devata- अग्निः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने॒ प्रय॑तदक्षिणं॒ नरं॒ वर्मे॑व स्यू॒तं परि॑ पासि वि॒श्वतः॑। स्वा॒दु॒क्षद्मा॒ यो व॑स॒तौ स्यो॑न॒कृज्जी॑वया॒जं यज॑ते॒ सोप॒मा दि॒वः ॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । प्रय॑तऽदक्षिणम् । नर॑म् । वर्म॑ऽइव । स्यू॒तम् । परि॑ । पा॒सि॒ । वि॒श्वतः॑ । स्वा॒दु॒ऽक्षद्मा॑ । यः । व॒स॒तौ । स्यो॒न॒ऽकृत् । जी॒व॒ऽया॒जम् । यज॑ते । सः । उ॒प॒ऽमा । दि॒वः ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने प्रयतदक्षिणं नरं वर्मेव स्यूतं परि पासि विश्वतः। स्वादुक्षद्मा यो वसतौ स्योनकृज्जीवयाजं यजते सोपमा दिवः ॥

त्वम्। अग्ने। प्रयतऽदक्षिणम्। नरम्। वर्मऽइव। स्यूतम्। परि। पासि। विश्वतः। स्वादुऽक्षद्मा। यः। वसतौ। स्योनऽकृत्। जीवऽयाजम्। यजते। सः। उपऽमा। दिवः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 34 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) सबको अच्छे प्रकार जाननेवाले सभापति आप (वर्म्मेव) कवच के समान (यः) जो (स्वादुक्षद्मा) शुद्ध अन्न जल का भोक्ता (स्योनकृत्) सबको सुखकारी मनुष्य (वसतौ) निवासदेश में नाना साधनयुक्त यज्ञों से (यजते) यज्ञ करता है, उस (प्रयतदक्षिणम्) अच्छे प्रकार विद्या धर्म के उपदेश करने (जीवयाजम्) और जीवों को यज्ञ करानेवाले (स्यूतम्) अनेक साधनों से कारीगरी में चतुर (नरम्) नम्र मनुष्य को (विश्वतः) सब प्रकार से (परिपासि) पालते हो (सः) ऐसे धर्मात्मा परोपकारी विद्वान् आप (दिवः) सूर्य के प्रकाश की (उपमा) उपमा पाते हो ॥ १५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सब के सुख करनेवाले पुरुषार्थी मनुष्य यत्न के साथ यज्ञों को करते हैं, वे जैसे सूर्य सबको प्रकाशित करके सुख देता है, वैसे सबको सुख देनेवाले होते हैं। जैसे युद्ध में प्रवृत्त हुए वीरों को शस्त्रों के घाओं से बख्तर बचाता है, वैसे ही सभापति राजा और राजजन सब धार्मिक सज्जनों को सब दुःखों से रक्षा करते रहें ॥ १५ ॥
Subject
फिर वह क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥