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Rigveda Mandal 1 / Sukta 31 / Mantra 13

191 Sukta
18 Mantra
1/31/13
Devata- अग्निः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने॒ यज्य॑वे पा॒युरन्त॑रोऽनिष॒ङ्गाय॑ चतुर॒क्ष इ॑ध्यसे। यो रा॒तह॑व्योऽवृ॒काय॒ धाय॑से की॒रेश्चि॒न्मन्त्रं॒ मन॑सा व॒नोषि॒ तम् ॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । यज्य॑वे । पा॒युः । अन्त॑रः । अ॒नि॒ष॒ङ्गाय॑ । च॒तुः॒ऽअ॒क्षः । इ॒ध्य॒से॒ । यः । रा॒तऽह॑व्यः । अ॒वृ॒काय॑ । धाय॑से । की॒रेः । चि॒त् । मन्त्र॑म् । मन॑सा । व॒नोषि॑ । तम् ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने यज्यवे पायुरन्तरोऽनिषङ्गाय चतुरक्ष इध्यसे। यो रातहव्योऽवृकाय धायसे कीरेश्चिन्मन्त्रं मनसा वनोषि तम् ॥

त्वम्। अग्ने। यज्यवे। पायुः। अन्तरः। अनिषङ्गाय। चतुःऽअक्षः। इध्यसे। यः। रातऽहव्यः। अवृकाय। धायसे। कीरेः। चित्। मन्त्रम्। मनसा। वनोषि। तम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 34 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (त्वम्) सभापति ! तू (मनसा) विज्ञान से (मन्त्रम्) विचार वा वेदमन्त्र को सेवनेवाले के (चित्) सदृश (रातहव्यः) रातहव्य अर्थात् होम में लेने-देने के योग्य पदार्थों का दाता (पायुः) पालना का हेतु (अन्तरः) मध्य में रहनेवाला और (चतुरक्षः) सेना के अङ्ग अर्थात् हाथी घोड़े और रथ के आश्रय से युद्ध करनेवाले और पैदल योद्धाओं में अच्छी प्रकार चित्त देता हुआ (अनिषङ्गाय) जिस पक्षपातरहित न्याययुक्त (अवृकाय) चोरी आदि दोष के सर्वथा त्याग और (धायसे) उत्तम गुणों के धारण तथा (यज्यवे) यज्ञ वा शिल्प विद्या सिद्ध करनेवाले मनुष्य के लिये (इध्यसे) तेजस्वी होकर अपना प्रताप दिखाता है, या कि जिसको (वनोषि) सेवन करता है, उस (कीरेः) प्रशंसनीय वचन कहनेवाले विद्वान् से विनय को प्राप्त होके प्रजा का पालन किया कर ॥ १३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्यार्थी लोग अध्यापक अर्थात् पढ़ानेवालों से उत्तम विचार के साथ उत्तम-उत्तम विद्यार्थियों का सेवन करते हैं, वैसे तू भी धार्मिक विद्वानों के उपदेश के अनुकूल होके राजधर्म का सेवन करता रह ॥ १३ ॥
Subject
अब अगले मन्त्र में भौतिक अग्नि गुणयुक्त सभा स्वामी का उपदेश किया है ॥