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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 9

191 Sukta
22 Mantra
1/30/9
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अनु॑ प्र॒त्नस्यौक॑सो हु॒वे तु॑विप्र॒तिं नर॑म्। यं ते॒ पूर्वं॑ पि॒ता हु॑वे॥

अनु॑ । प्र॒त्नस्य॑ । ओक॑सः । हु॒वे । तु॒वि॒ऽप्र॒तिम् । नर॑म् । यम् । ते॒ । पूर्व॑म् । पि॒ता । हु॒वे ॥

Mantra without Swara
अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्। यं ते पूर्वं पिता हुवे॥

अनु। प्रत्नस्य। ओकसः। हुवे। तुविऽप्रतिम्। नरम्। यम्। ते। पूर्वम्। पिता। हुवे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 29 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य ! (ते) तेरा (पिता) जनक वा आचार्य्य (यम्) जिस (प्रत्नस्य) सनातन कारण वा (ओकसः) सबके ठहरने योग्य आकाश के सकाश से (तुविप्रतिम्) बहुत पदार्थों को प्रसिद्ध करने और (नरम्) सबको यथायोग्य कार्य्यों में लगानेवाले परमेश्वर वा सभाध्यक्ष का (पूर्वम्) पहिले (हुवे) आह्वान करता रहा, उन का मैं भी (अनुहुवे) तदनुकूल आह्वान वा स्तवन करता हूँ॥९॥
Essence
ईश्वर मनुष्यों को उपदेश करता है कि हे मनुष्यो ! तुम को औरों के लिये ऐसा उपदेश करना चाहिये कि जो अनादि कारण से अनेक प्रकार के कार्य्यों को उत्पन्न करता है तथा जिस की उपासना पहिले विद्वानों ने की वा अब के करते और अगले करेंगे, उसी की उपासना नित्य करनी चाहिये। इस मन्त्र में ऐसा विषय है कि कोई किसी से पूछे कि तुम किस की उपासना करते हो? उसके लिये ऐसा उत्तर देवे कि जिसकी तुम्हारे पिता वा सब विद्वान् जन करते तथा वेद जिस निराकार, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, अज और अनादि स्वरूप जगदीश्वर का प्रतिपादन करते हैं, उसी की उपासना मैं निरन्तर करता हूँ॥९॥
Subject
अब ईश्वर और सभाध्यक्ष की प्रार्थना सब मनुष्यों को करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥