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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 5

191 Sukta
22 Mantra
1/30/5
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स्तो॒त्रं रा॑धानां पते॒ गिर्वा॑हो वीर॒ यस्य॑ ते। विभू॑तिरस्तु सू॒नृता॑॥

स्तो॒त्रम् । रा॒धा॒ना॒म् । प॒ते॒ । गिर्वा॑हः । वी॒र॒ । यस्य॑ । ते॒ । विऽभू॑तिः । अ॒स्तु॒ । सु॒नृता॑ ॥

Mantra without Swara
स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते। विभूतिरस्तु सूनृता॥

स्तोत्रम्। राधानाम्। पते। गिर्वाहः। वीर। यस्य। ते। विऽभूतिः। अस्तु। सुनृता॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 28 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (गिर्वाहः) जानने योग्य पदार्थों के जानने और सुख-दुःखों के नाश करनेवाले तथा (राधानाम्) जिन पृथिवी आदि पदार्थों में सुख सिद्ध होते हैं, उनके (पते) पालन करनेवाले सभा वा सेना के स्वामी विद्वान् (यस्य) जिन (ते) आपका (सूनृता) श्रेष्ठता से सब गुण का प्रकाश करनेवाला (विभूतिः) अनेक प्रकार का ऐश्वर्य्य है, सो आप के सकाश से हम लोगों के लिये (स्तोत्रम्) स्तुति (नः) हमारे पूर्वोक्त (मदाय) आनन्द और (शुष्मिणे) बल के लिये (अस्तु) हो॥५॥
Essence
इस मन्त्र में पिछले तीसरे मन्त्र से (मदाय) (शुष्मिणे) (नः) इन तीन पदों अनुवृत्ति है। हम लोगों को सब का स्वामी जो कि वेदों से परिपूर्ण विज्ञानरत ऐश्वर्य्ययुक्त और यथायोग्य न्याय करनेवाला सभाध्यक्ष वा सेनापति विद्वान् है, उसी को न्यायाधीश मानना चाहिये॥५॥
Subject
अब अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से सभा वा सेना के स्वामी का उपदेश किया है॥