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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 4

191 Sukta
22 Mantra
1/30/4
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒यमु॑ ते॒ सम॑तसि क॒पोत॑इव गर्भ॒धिम्। वच॒स्तच्चि॑न्न ओहसे॥

अ॒यम् । ऊँम् इति॑ । ते॒ । सम् । अ॒त॒सि॒ । क॒पोतः॑ऽइव । ग॒र्भ॒ऽधिम् । वचः॑ । तत् । चि॒त् । नः॒ । ओ॒ह॒से॒ ॥

Mantra without Swara
अयमु ते समतसि कपोतइव गर्भधिम्। वचस्तच्चिन्न ओहसे॥

अयम्। ऊँम् इति। ते। सम्। अतसि। कपोतःऽइव। गर्भऽधिम्। वचः। तत्। चित्। नः। ओहसे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 28 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(अयम्) यह इन्द्र अग्नि जो कि परमेश्वर का रचा है (उ) हम जानते हैं कि जैसे (गर्भधिम्) कबूतरी को (कपोत इव) कबूतर प्राप्त हो, वैसे (नः) हमारी (वचः) वाणी को (समोहसे) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है और (चित्) वही सिद्ध किया हुआ (नः) हम लोगों को (तत्) पूर्व कहे हुए बल आदि गुण बढ़ानेवाले आनन्द के लिये (अतसि) निरन्तर प्राप्त करता है॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कबूतर अपने वेग से कबूतरी को प्राप्त होता है, वैसे ही शिल्पविद्या से सिद्ध किया हुआ अग्नि अनुकूल अर्थात् जैसे चाहिये वैसे गति को प्राप्त होता है। मनुष्य इस विद्या को उपदेश वा श्रवण से पा सकते हैं॥४॥
Subject
फिर भी उसी विषय का अगले मन्त्र में प्रकाश किया है॥