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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 22

191 Sukta
22 Mantra
1/30/22
Devata- उषाः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं त्येभि॒रा ग॑हि॒ वाजे॑भिर्दुहितर्दिवः। अ॒स्मे र॒यिं नि धा॑रय॥

त्वम् । त्येभिः॑ । आ । ग॒हि॒ । वाजे॑भिः । दु॒हि॒तः॒ । दि॒वः॒ । अ॒स्मे इति॑ । र॒यिम् । नि । धा॒र॒य॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं त्येभिरा गहि वाजेभिर्दुहितर्दिवः। अस्मे रयिं नि धारय॥

त्वम्। त्येभिः। आ। गहि। वाजेभिः। दुहितः। दिवः। अस्मे इति। रयिम्। नि। धारय॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 31 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे काल के माहात्म्य को जाननेवाले विद्वान् (त्वम्) तू जो (दिवः) सूर्य किरणों से उत्पन्न हुई उनकी (दुहितः) लड़की के समान प्रातःकाल की वेला (त्येभिः) उसके उत्तम अवयव अर्थात् दिन महीना आदि विभागों से वह हम लोगों को (वाजेभिः) अन्न आदि पदार्थों के साथ प्राप्त होती और धनादि पदार्थों की प्राप्ति का निमित्त होती है, उससे (अस्मे) हम लोगों के लिये (रयिम्) विद्या, सुवर्णादि धनों को (निधारय) निरन्तर ग्रहण कराओ और (आगहि) इस प्रकार इस विद्या की प्राप्ति कराने के लिये प्राप्त हुआ कीजिये कि जिससे हम लोग भी समय को निरर्थक न खोवें॥२२॥
Essence
जो मनुष्य कुछ भी व्यर्थ काल नहीं खोते, उन का सब काल सब कामों की सिद्धि का करनेवाला होता है॥२२॥इस मन्त्र में पिछले सूक्त के अनुषङ्गी (इन्द्र) (अश्वि) और (उषा) समय के वर्णन से पिछले सूक्त के अनुषङ्गी अर्थों के साथ इस सूक्त के अर्थ की संगति जाननी चाहिये।
Subject
फिर वह कैसी है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥