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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 20

191 Sukta
22 Mantra
1/30/20
Devata- उषाः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
कस्त॑ उषः कधप्रिये भु॒जे मर्तो॑ अमर्त्ये। कं न॑क्षसे विभावरि॥

कः । ते॒ । उ॒षः॒ । क॒ध॒ऽप्रि॒ये॒ । भु॒जे । मर्तः॑ । अ॒म॒र्त्ये॒ । कम् । न॒क्ष॒से॒ । वि॒भा॒ऽव॒रि॒ ॥

Mantra without Swara
कस्त उषः कधप्रिये भुजे मर्तो अमर्त्ये। कं नक्षसे विभावरि॥

कः। ते। उषः। कधऽप्रिये। भुजे। मर्तः। अमर्त्ये। कम्। नक्षसे। विभाऽवरि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 31 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्याप्रियजन ! जो यह (अमर्त्ये) कारण प्रवाह रूप से नाशरहित (कधप्रिये) कथनप्रिय (विभावरि) और विविध जगत् को प्रकाश करनेवाली (उषा) प्रातःकाल की वेला (भुजे) सुख भोग कराने के लिये प्राप्त होती है, उसको प्राप्त होकर तू (कम्) किस मनुष्य को (नक्षसे) प्राप्त नहीं होता और (कः) कौन (मर्त्तः) मनुष्य (भुजे) सुख भोगने के लिये (ते) तेरे आश्रय को नहीं प्राप्त होता॥२०॥
Essence
इस मन्त्र में काक्वर्थ है। कौन मनुष्य इस काल की सूक्ष्म गति जो व्यर्थ खोने के अयोग्य है, उसको जाने जो पुरुषार्थ के आरम्भ का आदि समय प्रातःकाल है, उसके निश्चय से प्रातःकाल उठ कर जब तक सोने का समय न हो, एक भी क्षण व्यर्थ न खोवे। इस प्रकार समय के सार्थपन को जानते हुए मनुष्य सब काल सुख भोग सकते हैं, किन्तु आलस्य करनेवाले नहीं॥२०॥
Subject
अब इस विद्या के उपयोग करनेवाले प्रातःकाल का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥