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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 2

191 Sukta
22 Mantra
1/30/2
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
श॒तं वा॒ यः शुची॑नां स॒हस्रं॑ वा॒ समा॑शिराम्। एदु॑ नि॒म्नं न री॑यते॥

श॒तम् । वा॒ । यः । शुची॑नाम् । स॒हस्र॑म् । वा॒ । सम्ऽआ॑शिराम् । आ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । नि॒म्नम् । न । री॒य॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
शतं वा यः शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्। एदु निम्नं न रीयते॥

शतम्। वा। यः। शुचीनाम्। सहस्रम्। वा। सम्ऽआशिराम्। आ। इत्। ऊँ इति। निम्नम्। न। रीयते॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 28 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो शुद्ध गुण, कर्म, स्वभावयुक्त विद्वान् है, उसी से यह जो भौतिक अग्नि है, वह (निम्नम्) (न) जैसे नीचे स्थान को जाते हैं, वैसे (शुचीनाम्) शुद्ध कलायन्त्र वा प्रकाशवाले पदार्थों का (शतम्) (वा) सौ गुना अथवा (समाशिराम्) जो सब प्रकार से पकाए जावें, उन पदार्थों का (सहस्रम्) (वा) हजार गुना (आ) (इत्) (उ) आधार और दाह गुणवाला (रीयते) जानता है॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। यह अग्नि सूर्य और बिजली जो इसके प्रसिद्ध रूप हैं, सैकड़ों पदार्थों की शुद्धि करता है और पकने योग्य पदार्थों में हजारों पदार्थों को अपने वेग से पकाता है, जैसे जल नीची जगह को जाता है, वैसे ही यह अग्नि ऊपर को जाता है। इन अग्नि और जल को लौट-पौट करने अर्थात् अग्नि को नीचे और जल को ऊपर स्थापन करने से वा दोनों के संयोग से वेग आदि गुण उत्पन्न होते हैं॥२॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥