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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 19

191 Sukta
22 Mantra
1/30/19
Devata- अश्विनौ Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न्य१॒॑घ्न्यस्य॑ मू॒र्धनि॑ च॒क्रं रथ॑स्य येमथुः। परि॒ द्याम॒न्यदी॑यते॥

नि । अ॒घ्न्यस्य॑ । मू॒र्धनि॑ । च॒क्रम् । रथ॑स्य । ये॒म॒थुः॒ । परि॑ । द्याम् । अ॒न्यत् । ई॒य॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
न्य१घ्न्यस्य मूर्धनि चक्रं रथस्य येमथुः। परि द्यामन्यदीयते॥

नि। अघ्न्यस्य। मूर्धनि। चक्रम्। रथस्य। येमथुः। परि। द्याम्। अन्यत्। ईयते॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 31 Mantra » 4

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Meaning
हे अश्विनौ विद्यायुक्त शिल्पि लोगो ! तुम दोनों (अघ्न्यस्य) जो कि विनाश करने योग्य नहीं है, उस (रथस्य) विमान आदि यान के (मूर्धनि) उत्तम अङ्ग अग्रभाग में जो एक और (अन्यत्) दूसरा नीचे की ओर कलायन्त्र बनाओ तो वे दो चक्र समुद्र वा (द्याम्) आकाश पर भी (नियेमथुः) देश-देशान्तर में जाने के वास्ते बहुत अच्छे हों, इन दोनों चक्रों से जुड़ा हुआ रथ जहाँ चाहो वहाँ (ईयते) पहुँचानेवाला होता है॥१९॥
Essence
शिल्पी विद्वानों को योग्य है कि जो शीघ्र जाने आने के लिये रथ बनाना चाहें तो उसके आगे एक-एक कलायन्त्रयुक्त चक्र तथा सब कलाओं के घूमने के लिये दूसरा चक्र नीचे भाग में रच के उसमें यन्त्र के साथ जल और अग्नि आदि पदार्थों का प्रयोग करें। इस प्रकार रचा हुए यान भारसहित शिल्पी विद्वान् लोगों को भूमि, समुद्र और अन्तरिक्ष मार्ग से सुखपूर्वक देशान्तर को प्राप्त कराता है॥१९॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

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