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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 18

191 Sukta
22 Mantra
1/30/18
Devata- अश्विनौ Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स॒मा॒नयो॑जनो॒ हि वां॒ रथो॑ दस्रा॒वम॑र्त्यः। स॒मु॒द्रे अ॑श्वि॒नेय॑ते॥

स॒मा॒नऽयो॑जनः । हि । वा॒म् । रथः॑ । द॒स्रौ॒ । अम॑र्त्यः । स॒मु॒द्रे । अ॒श्वि॒ना॒ । ईय॑ते ॥

Mantra without Swara
समानयोजनो हि वां रथो दस्रावमर्त्यः। समुद्रे अश्विनेयते॥

समानऽयोजनः। हि। वाम्। रथः। दस्रौ। अमर्त्यः। समुद्रे। अश्विना। ईयते॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 31 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (दस्रौ) मार्ग चलने की पीड़ा को हरनेवाले (अश्विना) उक्त अश्वि के समान शिल्पकारी विद्वानो ! (वाम्) तुम्हारा जो सिद्ध किया हुआ (समानयोजनः) जिसमें तुल्य गुण से अश्व लगाये हों (अमर्त्यः) जिसके खींचने में मनुष्य आदि प्राणी न लगे हों, वह (रथः) नाव आदि रथसमूह (समुद्रे) जल से पूर्ण सागर वा अन्तरिक्ष में (ईयते) (अश्वावत्या) वेग आदि गुणयुक्त (शवीरया) देशान्तर को प्राप्त करानेवाली गति के साथ समुद्र के पार और वार को प्राप्त करानेवाला होता है, उसको सिद्ध कीजिये॥१८॥
Essence
इस मन्त्र में पूर्व मन्त्र से (अश्वावत्या) (शवीरया) इन दो पदों की अनुवृत्ति है। मनुष्यों की जो अग्नि, वायु और जलयुक्त कलायन्त्रों से सिद्ध की हुई नाव हैं, वे निस्सन्देह समुद्र के अन्त को जल्दी पहुँचाती हैं, ऐसी-ऐसी नावों के विना अभीष्ट समय में चाहे हुए एक स्थान से दूसरे स्थान को जाना नहीं हो सकता है॥१८॥
Subject
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥