Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 16

191 Sukta
22 Mantra
1/30/16
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
शश्व॒दिन्द्रः॒ पोप्रु॑थद्भिर्जिगाय॒ नान॑दद्भिः॒ शाश्व॑सद्भि॒र्धना॑नि। स नो॑ हिरण्यर॒थं दं॒सना॑वा॒न्त्स नः॑ सनि॒ता स॒नये॒ स नो॑ऽदात्॥

शश्व॑त् । इन्द्रः॑ । पोप्रु॑थत्ऽभिः । ज॒गा॒य॒ । नान॑दत्ऽभिः । शाश्व॑सत्ऽभिः । धना॑नि । सः । नः॒ । हि॒र॒ण्य॒ऽर॒थम् । दं॒सना॑ऽ वान् । सः । नः॒ । स॒नि॒ता । स॒नये॑ । सः । नः॒ । अ॒दा॒त् ॥

Mantra without Swara
शश्वदिन्द्रः पोप्रुथद्भिर्जिगाय नानदद्भिः शाश्वसद्भिर्धनानि। स नो हिरण्यरथं दंसनावान्त्स नः सनिता सनये स नोऽदात्॥

शश्वत्। इन्द्रः। पोप्रुथत्ऽभिः। जिगाय। नानदत्ऽभिः। शाश्वसत्ऽभिः। धनानि। सः। नः। हिरण्यऽरथम्। दंसनाऽ वान्। सः। नः। सनिता। सनये। सः। नः। अदात्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 31 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(इन्द्रः) जगत् का रचनेवाला ईश्वर (शश्वत्) अनादि सनातन कारण से (नानदद्भिः) तड़फ और गर्जना आदि शब्दों को करती हुई बिजली और नदी अचेतन और जीव तथा (शाश्वसद्भिः) अति प्रशंसनीय प्राणवाले चर वा (पोप्रुथद्भिः) स्थूल जो कि अचर हैं, उन कार्य्यरूपी पदार्थों से (धनानि) पृथिवी सुवर्ण और विद्या आदि धनों को (जिगाय) प्रकर्षता अर्थात् उन्नति को प्राप्त करता है (सः) वह (दंसनावान्) कर्मों का फल देने हारा और साधनों से संयुक्त ईश्वर (नः) हमारे लिये (हिरण्यरथम्) ज्योतिवाले सूर्य आदि लोक वा सुवर्ण आदि पदार्थों के प्राप्त करानेवाले पदार्थों को और विमान आदि रथों को (अदात्) प्रत्यक्ष करता है (सः) (नः) हम को सुखों के (सनये) भोग के लिये (सनिता) विद्या, कर्म और उपदेश से विभाग करनेवाला होकर सब सुखों को (अदात्) देता है, वैसा सभा, सेनापति और न्यायाधीश भी वर्तें॥१६॥
Essence
जैसे जगदीश्वर सनातन कारण से चर और अचर कार्यों को उत्पन्न करके इन्हीं से सब जीवों को सुख देता है, वैसे सभा, सेनापति, न्यायाधीश लोग सब सभा, सेना और न्याय के अङ्गों को सिद्ध कर सब प्रजा को निरन्तर आनन्दयुक्त करते हैं, जैसे इससे और कोई संसार का रचने वा कर्म फल का देने और ठीक न्याय से राज्य का पालन करनेवाला नहीं हो सकता, वैसे वे भी सब कार्य्य करें॥१६॥
Subject
फिर वह सभाध्यक्ष कैसा और क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥