Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 14

191 Sukta
22 Mantra
1/30/14
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ घ॒ त्वावा॒न्त्मना॒प्तः स्तो॒तृभ्यो॑ धृष्णविया॒नः। ऋ॒णोरक्षं॒ न च॒क्र्योः॑॥

आ । घ॒ । त्वाऽवा॑न् । त्मना॑ । आ॒प्तः । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । इ॒या॒नः । ऋ॒णोः । अक्ष॑म् । न । च॒क्र्योः॑ ॥

Mantra without Swara
आ घ त्वावान्त्मनाप्तः स्तोतृभ्यो धृष्णवियानः। ऋणोरक्षं न चक्र्योः॥

आ। घ। त्वाऽवान्। त्मना। आप्तः। स्तोतृऽभ्यः। धृष्णो इति। इयानः। ऋणोः। अक्षम्। न। चक्र्योः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 30 Mantra » 4

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे (धृष्णो) अति धृष्ट (त्मना) अपनी कुशलता से (आप्तः) सर्वविद्यायुक्त सत्य के उपदेश करने और (इयानः) राज्य को जाननेवाले राजन् ! (त्वावान्) आप से (घ) आप ही हो जो आप (चक्र्योः) रथ के पहियों की (अक्षम्) धुरी के (न) समान (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वालों को (आऋणोः) प्राप्त होते हो॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार और प्रतीपालङ्कार हैं। जैसे पहियों की धुरी रथ को धारण करनेवाली घूमती भी अपने ही में ठहरी सी रहती है और रथ को देशान्तर में प्राप्त करनेवाली होती है, वैसे ही आप राज्य को व्याप्त होकर यथायोग्य नियम में रखते हो॥१४॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.