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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 12

191 Sukta
22 Mantra
1/30/12
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तथा॒ तद॑स्तु सोमपाः॒ सखे॑ वज्रि॒न्तथा॑ कृणु। यथा॑ त उ॒श्मसी॒ष्टये॑॥

तथा॑ । तत् । अ॒स्तु॒ । सो॒म॒ऽपाः॒ । सखे॑ । व॒ज्रि॒न् । तथा॑ । कृ॒णु॒ । यथा॑ । ते॒ । उ॒श्मसि॑ । इ॒ष्टये॑ ॥

Mantra without Swara
तथा तदस्तु सोमपाः सखे वज्रिन्तथा कृणु। यथा त उश्मसीष्टये॥

तथा। तत्। अस्तु। सोमऽपाः। सखे। वज्रिन्। तथा। कृणु। यथा। ते। उश्मसि। इष्टये॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 30 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोमपाः) सांसारिक पदार्थों से जीवों की रक्षा करनेवाले (वज्रिन्) सभाध्यक्ष ! जैसे हम लोग (इष्टये) अपने सुख के लिये (ते) आप शस्त्रास्त्रवित् (सखे) मित्र की मित्रता के अनुकूल जिस मित्राचरण के करने को (उश्मसि) चाहते और करते हैं (तथा) उसी प्रकार से आपकी (तत्) मित्रता हमारे में (अस्तु) हो, आप (तथा) वैसे (कृणु) कीजिये॥१२॥
Essence
जैसे सब का हित चाहनेवाला और सकल विद्यायुक्त सभा सेनाध्यक्ष निरन्तर प्रजा की रक्षा करे, वैसे ही प्रजा सेना के मनुष्यों को भी उसकी रक्षा की सम्भावना करनी चाहिये॥१२॥
Subject
अब उस सभाध्यक्ष को क्या-क्या उपदेश करने के योग्य है, यह अगले मन्त्र में कहा है॥