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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 11

191 Sukta
22 Mantra
1/30/11
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- पादनिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒स्माकं॑ शि॒प्रिणी॑नां॒ सोम॑पाः सोम॒पाव्ना॑म्। सखे॑ वज्रि॒न्त्सखी॑नाम्॥

अ॒स्माक॑म् । शि॒प्रिणी॑नाम् । सोम॑ऽपाः । सो॒म॒ऽपाव्ना॑म् । सखे॑ । व॒ज्रि॒न् । सखी॑नाम् ॥

Mantra without Swara
अस्माकं शिप्रिणीनां सोमपाः सोमपाव्नाम्। सखे वज्रिन्त्सखीनाम्॥

अस्माकम्। शिप्रिणीनाम्। सोमऽपाः। सोमऽपाव्नाम्। सखे। वज्रिन्। सखीनाम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 30 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे (सोमपाः) उत्पन्न किये हुए पदार्थ की रक्षा करनेवाले (वज्रिन्) सब अविद्यारूपी अन्धकार के विनाशक उत्तम ज्ञानयुक्त (सखे) समस्त सुख देने और (सोमपाव्नाम्) सांसारिक पदार्थों की रक्षा करनेवाले (सखीनाम्) सबके मित्र हम लोगों के तथा (सखीनाम्) सबका हित चाहनेहारी वा (शिप्रिणीनाम्) इस लोक और परलोक के व्यवहार ज्ञानवाली हमारी स्त्रियों को सब प्रकार से प्रधान (त्वा) आप को (वयम्) करनेवाले हम लोग (आशास्महे) प्राप्त होने की इच्छा करते हैं॥११॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है और पूर्व मन्त्र से (त्वा) (वयम्) (आ) (शास्महे) इन चार पदों की अनुवृत्ति है। सब पुरुष वा सब स्त्रियों को परस्पर मित्रभाव का वर्त्ताव कर व्यवहार की सिद्धि के लिये परमेश्वर की प्रार्थना वा आर्य्य राजविद्या और धर्म सभा प्रयत्न के साथ सदा सम्पादन करनी चाहिये॥११॥
Subject
फिर सभा सेनाध्यक्ष के प्राप्त होने की इच्छा करने का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

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