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Rigveda Mandal 1 / Sukta 30 / Mantra 10

191 Sukta
22 Mantra
1/30/10
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं त्वा॑ व॒यं वि॑श्ववा॒रा शा॑स्महे पुरुहूत। सखे॑ वसो जरि॒तृभ्यः॑॥

तम् । त्वा॒ । व॒यम् । वि॒श्व॒ऽवा॒र॒ । आ । शा॒स्म॒हे॒ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । सखे॑ । व॒सो॒ इति॑ । ज॒रि॒तृऽभ्यः॑ ॥

Mantra without Swara
तं त्वा वयं विश्ववारा शास्महे पुरुहूत। सखे वसो जरितृभ्यः॥

तम्। त्वा। वयम्। विश्वऽवार। आ। शास्महे। पुरुऽहूत। सखे। वसो इति। जरितृऽभ्यः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 29 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विश्ववार) संसार को अनेक प्रकार सिद्ध करने (पुरुहूत) सब से स्तुति को प्राप्त होने (वसो) सब में रहने वा सबको अपने में बसानेवाले (सखे) सबके मित्र जगदीश्वर ! (तम्) पूर्वोक्त (त्वा) आपकी (वयम्) हम लोग (जरितृभ्यः) स्तुति करनेवाले धार्मिक विद्वानों से (आ) सब प्रकार से (शास्महे) आशा करते हैं अर्थात् आपके विशेष ज्ञान प्रकाश की इच्छा करते हैं॥१०॥
Essence
मनुष्यों को विद्वानों के समागम ही से सब जगत् के रचने, सबके पूजने योग्य, सबके मित्र, सबके आधार, पिछले मन्त्र से प्रतिपादित किये हुए परमेश्वर के विज्ञान वा उपासना की नित्य इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि विद्वानों के उपदेश के विना किसी को यथायोग्य विशेष ज्ञान नहीं हो सकता है॥१०॥
Subject
अब ईश्वर की प्रार्थना के विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥