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Rigveda Mandal 1 / Sukta 3 / Mantra 4

191 Sukta
12 Mantra
1/3/4
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्रा या॑हि चित्रभानो सु॒ता इ॒मे त्वा॒यवः॑। अण्वी॑भि॒स्तना॑ पू॒तासः॑॥

इन्द्र॑ । आ । या॒हि॒ । चि॒त्र॒भा॒नो॒ इति॑ चित्रऽभानो । सु॒ताः । इ॒मे । त्वा॒ऽयवः॑ । अण्वी॑भिः । तना॑ । पू॒तासः॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः। अण्वीभिस्तना पूतासः॥

इन्द्र। आ। याहि। चित्रभानो इति चित्रऽभानो। सुताः। इमे। त्वाऽयवः। अण्वीभिः। तना। पूतासः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
(चित्रभानो) हे आश्चर्य्यप्रकाशयुक्त (इन्द्र) परमेश्वर ! आप हमको कृपा करके प्राप्त हूजिये। कैसे आप हैं कि जिन्होंने (अण्वीभिः) कारणों के भागों से (तना) सब संसार में विस्तृत (पूतासः) पवित्र और (त्वायवः) आपके उत्पन्न किये हुए व्यवहारों से युक्त (सुताः) उत्पन्न हुए मूर्तिमान् पदार्थ उत्पन्न किये हैं, हम लोग जिनसे उपकार लेनेवाले होते हैं, इससे हम लोग आप ही के शरणागत हैं। दूसरा अर्थ-जो सूर्य्य अपने गुणों से सब पदार्थों को प्राप्त होता है, वह (अण्वीभिः) अपनी किरणों से (तना) संसार में विस्तृत (त्वायवः) उसके निमित्त से जीनेवाले (पूतासः) पवित्र (सुताः) संसार के पदार्थ हैं, वही इन उनको प्रकाशयुक्त करता है॥४॥
Essence
यहाँ श्लेषालङ्कार समझना। जो-जो इस मन्त्र में परमेश्वर और सूर्य्य के गुण और कर्म प्रकाशित किये गये हैं, इनसे परमार्थ और व्यवहार की सिद्धि के लिये अच्छी प्रकार उपयोग लेना सब मनुष्यों को योग्य है॥४॥
Subject
परमेश्वर ने अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से अपना और सूर्य्य का उपदेश किया है-

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