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Rigveda Mandal 1 / Sukta 29 / Mantra 7

191 Sukta
7 Mantra
1/29/7
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सर्वं॑ परिक्रो॒शं ज॑हि ज॒म्भया॑ कृकदा॒श्व॑म्। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

सर्व॑म् । प॒रि॒ऽक्रो॒शम् । ज॒हि॒ । ज॒म्भय॑ । कृ॒क॒दा॒श्व॑म् । आ । तु । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । शं॒स॒य॒ । गोषु॑ । अश्वे॑षु । शु॒भ्रिषु॑ । स॒हस्रे॑षु । तु॒वी॒ऽम॒घ॒ ॥

Mantra without Swara
सर्वं परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम्। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥

सर्वम्। परिऽक्रोशम्। जहि। जम्भय। कृकदाश्वम्। आ। तु। नः। इन्द्र। शंसय। गोषु। अश्वेषु। शुभ्रिषु। सहस्रेषु। तुवीऽमघ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 7

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Meaning
हे (तुविमघ) अनन्त बलरूप धनयुक्त (इन्द्र) सब शत्रुओं के विनाश करनेवाले जगदीश्वर आप जो (नः) हमारे (सहस्रेषु) अनेक (शुभ्रिषु) शुद्ध कर्मयुक्त व्यवहार वा (गोषु) पृथिवी के राज्य आदि व्यवहार तथा (अश्वेषु) घोड़े आदि सेना के अङ्गों में विनाश का करानेवाला व्यवहार हो, उस (परिक्रोशम्) सब प्रकार से रुलानेवाले व्यवहार को (जहि) विनष्ट कीजिये तथा जो (नः) हमारा शत्रु हो (कृकदाश्वम्) उस दुःख देनेवाले को भी (जम्भय) विनाश को प्राप्त कीजिये। इस रीति से (तु) फिर (नः) हम लोगों को (आशंसय) शत्रुओं से पृथक् कर सुखयुक्त कीजिये॥७॥
Essence
मनुष्यों को इस प्रकार जगदीश्वर की प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमात्मन् ! आप हम लोगों में जो दुष्ट व्यवहार अर्थात् खोटे चलन तथा जो हमारे शत्रु हैं, उनको दूर कर हम लोगों के लिये सकल ऐश्वर्य दीजिये॥७॥पिछले सूक्त में पदार्थ विद्या और उसके साधन कहे हैं, उनके उपादान अत्यन्त प्रसिद्ध कराने हारे संसार के पदार्थ हैं, जो कि परमेश्वर ने उत्पन्न किये हैं, इस सूक्त में उन पदार्थों से उपकार ले सकनेवाली सभाध्यक्ष सहित सभा होती है, उसके वर्णन करने से पूर्वोक्त अट्ठाईसवें सूक्त के अर्थ के साथ इस उनतीसवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये।
Subject
फिर वह क्या करे इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

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