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Rigveda Mandal 1 / Sukta 29 / Mantra 4

191 Sukta
7 Mantra
1/29/4
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स॒सन्तु॒ त्या अरा॑तयो॒ बोध॑न्तु शूर रा॒तयः॑। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

स॒सन्तु॑ । त्याः । अरा॑तयः । बोध॑न्तु । शू॒र॒ । रा॒तयः॑ । आ । तु । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । शं॒स॒य॒ । गोषु॑ । अश्वे॑षु । शु॒भ्रिषु॑ । स॒हस्रे॑षु । तु॒वी॒ऽम॒घ॒ ॥

Mantra without Swara
ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातयः। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥

ससन्तु। त्याः। अरातयः। बोधन्तु। शूर। रातयः। आ। तु। नः। इन्द्र। शंसय। गोषु। अश्वेषु। शुभ्रिषु। सहस्रेषु। तुवीऽमघ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (तुविमघ) विद्या सुवर्ण सेना आदि धनयुक्त (शूर) शत्रुओं के बल को नष्ट करनेवाले सेनापति ! आप के (अरातयः) जो दान आदि धर्म से रहित शत्रुजन हैं, वे (ससन्तु) सो जावें और जो (रातयः) दान आदि धर्म के कर्त्ता हैं (त्याः) वे (बोधन्तु) जाग्रत् होकर शत्रु और मित्रों को जानें (तु) फिर हे (इन्द्र) अत्युत्तम ऐश्वर्ययुक्त सभाध्यक्ष सेनापते वीरपुरुष ! तू (सहस्रेषु) हजारह (शुभ्रिषु) अच्छे-अच्छे गुणवाले (गोषु) गौ वा (अश्वेषु) घोड़े हाथी सुवर्ण आदि धनों में (नः) हम लोगों को (आशंसय) शत्रुओं के विजय से प्रशंसावाले करो॥४॥
Essence
हम लोगों को अपनी सेना में शूर ही मनुष्य रखकर आनन्दित करने चाहिये, जिससे भय के मारे दुष्ट और शत्रुजन जैसे निद्रा में शान्त होते हैं, वैसे सर्वदा हों, जिससे हम लोग निष्कण्टक अर्थात् बेखटके चक्रवर्त्ति राज्य का सेवन नित्य करें॥४॥
Subject
मनुष्यों को कैसे वीरों को ग्रहण करके शत्रु-निवारण करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥