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Rigveda Mandal 1 / Sukta 29 / Mantra 3

191 Sukta
7 Mantra
1/29/3
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नि ष्वा॑पया मिथू॒दृशा॑ स॒स्तामबु॑ध्यमाने। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

नि । स्वा॒प॒य॒ । मि॒थु॒ऽदृशा॑ । स॒स्ताम् । अबु॑ध्यमाने॒ इति॑ । आ । तु । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । शं॒स॒य॒ । गोषु॑ । अश्वे॑षु । शु॒भ्रिषु॑ । स॒हस्रे॑षु । तु॒वी॒ऽम॒घ॒ ॥

Mantra without Swara
नि ष्वापया मिथूदृशा सस्तामबुध्यमाने। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥

नि। स्वापय। मिथुऽदृशा। सस्ताम्। अबुध्यमाने इति। आ। तु। नः। इन्द्र। शंसय। गोषु। अश्वेषु। शुभ्रिषु। सहस्रेषु। तुवीऽमघ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (तुविमघ) अनेक प्रकार के धनयुक्त (इन्द्र) अविद्यारूपी निद्रा और दोषों को दूर करनेवाले विद्वान् ! जो-जो (मिथूदृशा) विषयाशक्ति अर्थात् खोटे काम वा प्रमाद अच्छे कामों के विनाश को दिखानेवाले वा (अबुध्यमाने) बोधनिवारक शरीर और मन (सस्ताम्) शयन और पुरुषार्थ का नाश करते हैं, उनको आप (निष्वापय) अच्छे प्रकार निवारण कर दीजिये (तु) फिर (सहस्रेषु) हजारहों (शुभ्रिषु) प्रशंसनीय गुणवाले (गोषु) पृथिवी आदि पदार्थ वा (अश्वेषु) वस्तु-वस्तु में रहनेवाले अग्नि आदि पदार्थों में (नः) हम लोगों को (आशंसय) अच्छे गुणवाले कीजिये॥३॥
Essence
मनुष्यों को शरीर और आत्मा से आलस्य को दूर छोड़ के उत्तम कर्मों में नित्य प्रयत्न करना चाहिये॥३॥
Subject
फिर वह क्या-क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥