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Rigveda Mandal 1 / Sukta 28 / Mantra 6

191 Sukta
9 Mantra
1/28/6
Devata- इन्द्रयज्ञसोमाः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उ॒त स्म॑ ते वनस्पते॒ वातो॒ विवा॒त्यग्र॒मित्। अथो॒ इन्द्रा॑य॒ पात॑वे सु॒नु सोम॑मुलूखल॥

उ॒त । स्म॒ । ते॒ । व॒न॒स्प॒ते॒ । वातः॑ । वि । वा॒ति॒ । अग्र॑म् । इत् । अथो॒ इति॑ । इन्द्रा॑य । पात॑वे । सु॒नु । सोम॑म् । उ॒लू॒ख॒ल॒ ॥

Mantra without Swara
उत स्म ते वनस्पते वातो विवात्यग्रमित्। अथो इन्द्राय पातवे सुनु सोममुलूखल॥

उत। स्म। ते। वनस्पते। वातः। वि। वाति। अग्रम्। इत्। अथो इति। इन्द्राय। पातवे। सुनु। सोमम्। उलूखल॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे विद्वन् ! जैसे (वातः) वायु (इत्) ही (वनस्पते) वृक्ष आदि पदार्थों के (अग्रम्) ऊपरले भाग को (उत) भी (वि वाति) अच्छे प्रकार पहुँचाता (स्म) पहुँचा वा पहुँचेगा (अथो) इसके अनन्तर (इन्द्राय) प्राणियों के लिये (सोमम्) सब ओषधियों के सार को (पातवे) पान करने को सिद्ध करता है, वैसे (उलूखल) उखरी में यव आदि ओषधियों के समुदाय के सार को (सुनु) सिद्ध कर॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब पवन सब वनस्पति ओषधियों को अपने वेग से स्पर्श कर बढ़ाता है, तभी प्राणी उनको उलूखल में स्थापन करके उनका सार ले सकते और रस भी पीते हैं। इस वायु के विना किसी पदार्थ की वृद्धि वा पुष्टि होने का सम्भव नहीं हो सकता है॥६॥
Subject
फिर वह किसलिये ग्रहण करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

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