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Rigveda Mandal 1 / Sukta 28 / Mantra 5

191 Sukta
9 Mantra
1/28/5
Devata- इन्द्रयज्ञसोमाः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यच्चि॒द्धि त्वं गृ॒हेगृ॑ह॒ उलू॑खलक यु॒ज्यसे॑। इ॒ह द्यु॒मत्त॑मं वद॒ जय॑तामिव दुन्दु॒भिः॥

यत् । चि॒त् । हि । त्वम् । गृ॒हेऽगृ॑हे । उलू॑खलक । यु॒ज्यसे॑ । इ॒ह । द्यु॒मत्ऽत॑मम् । व॒द॒ । जय॑ताम्ऽइव । दु॒न्दु॒भिः ॥

Mantra without Swara
यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे। इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः॥

यत्। चित्। हि। त्वम्। गृहेऽगृहे। उलूखलक। युज्यसे। इह। द्युमत्ऽतमम्। वद। जयताम्ऽइव। दुन्दुभिः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (उलूखलक) उलूखल से व्यवहार लेनेवाले विद्वान् ! तू (यत्) जिस कारण (हि) प्रसिद्ध (गृहेगृहे) घर-घर में (युज्यसे) उक्त विद्या का व्यवहार वर्त्तता है (इह) इस संसार गृह वा स्थान में (जयताम्) शत्रुओं को जीतनेवालों के (दुन्दुभिः) नगाड़ों के (इव) समान (द्युमत्तमम्) जिसमें अच्छे शब्द निकले, वैसे उलूखल के व्यवहार की (वद) विद्या का उपदेश करें॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब घरों में उलूखल और मुसल को स्थापन करना चाहिये, जैसे शत्रुओं के जीतनेवाले शूरवीर मनुष्य अपने नगाड़ों को बजा कर युद्ध करते हैं, वैसे ही रस चाहनेवाले मनुष्यों को उलूखल में यव आदि ओषधियों को डालकर मुसल से कूटकर भूसा आदि दूर करके सार-सार लेना चाहिये॥५॥
Subject
उक्त उलूखल से क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥