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Rigveda Mandal 1 / Sukta 28 / Mantra 4

191 Sukta
9 Mantra
1/28/4
Devata- इन्द्रयज्ञसोमाः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यत्र॒ मन्थां॑ विब॒ध्नते॑ र॒श्मीन्यमि॑त॒वाइ॑व। उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः॥

यत्र॑ । मन्था॑म् । वि॒ऽब॒ध्नते॑ । र॒श्मीन् । यमि॑त॒वैऽइ॑व । उ॒लूख॑लऽसुतानाम् । अव॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । इ॒न्द्र॒ । ज॒ल्गु॒लः॒ ॥

Mantra without Swara
यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवाइव। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥

यत्र। मन्थाम्। विऽबध्नते। रश्मीन्। यमितवैऽइव। उलूखलऽसुतानाम्। अव। इत्। ऊँ इति। इन्द्र। जल्गुलः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे (इन्द्र) सुख की इच्छा करनेवाले विद्वान् मनुष्य ! तू (रश्मीन्) (इव) जैसे (यमितवै) सूर्य्य अपनी किरणों को वा सारथी जैसे घोड़े आदि पशुओं की रस्सियों को (यत्र) जिस क्रिया से सिद्ध होनेवाले व्यवहार में (मन्थाम्) घृत आदि पदार्थों के निकालने के लिये मन्थनियों को (विबध्नते) अच्छे प्रकार बाँधते हैं, वहाँ (उलूखलसुतानाम्) उलूखल से सिद्ध हुए पदार्थों को (अव) वैसे ही सिद्ध करने की इच्छा कर (उ) और (इत्) उसी विद्या को (जल्गुलः) युक्ति के साथ उपदेश कर॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ईश्वर उपदेश करता है कि हे विद्वानो ! जैसे सूर्य्य अपनी किरणों के साथ भूमि को आकर्षण शक्ति से बाँधता और जैसे सारथी रश्मियों से घोड़ों को नियम में रखता है, वैसे ही मथने बाँधने और चलाने की विद्या से दूध आदि वा औषधि आदि पदार्थों से मक्खन आदि पदार्थों को युक्ति के साथ सिद्ध करो॥४॥
Subject
इसके सम्बन्धी और भी साधन का अगले मन्त्र में उपदेश किया है॥

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