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Rigveda Mandal 1 / Sukta 28 / Mantra 3

191 Sukta
9 Mantra
1/28/3
Devata- इन्द्रयज्ञसोमाः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यत्र॒ नार्य॑पच्य॒वमु॑पच्य॒वं च॒ शिक्ष॑ते। उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः॥

यत्र॑ । नारी॑ । अ॒प॒ऽच्य॒वम् । उ॒प॒ऽच्य॒वम् । च॒ । शिक्ष॑ते । उ॒लूख॑लऽसुतानाम् । अव॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । इ॒न्द्र॒ । ज॒ल्गु॒लः॒ ॥

Mantra without Swara
यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥

यत्र। नारी। अपऽच्यवम्। उपऽच्यवम्। च। शिक्षते। उलूखलऽसुतानाम्। अव। इत्। ऊँ इति। इन्द्र। जल्गुलः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) इन्द्रियों के स्वामी जीव ! तू (यत्र) जिस कर्म में घर के बीच (नारी) स्त्रियाँ काम करनेवाली अपनी संगी स्त्रियों के लिये (उलूखलसुतानाम्) उक्त उलूखलों से सिद्ध की हुई विद्या को (अपच्यवम्) (उपच्यवम्) (च) अर्थात् जैसे डालना निकालनादि क्रिया करनी होती है, वैसे उस विद्या को (शिक्षते) शिक्षा से ग्रहण करती और कराती हैं, उसको (उ) अनेक तर्कों के साथ (जल्गुलः) सुनो और इस विद्या का उपदेश करो॥३॥
Essence
यह उलूखलविद्या जो कि भोजनादि के पदार्थ सिद्ध करनेवाली है, गृहसम्बन्धि कार्य करनेवाली होने से यह विद्या स्त्रियों को नित्य ग्रहण करनी और अन्य स्त्रियों को सिखाना भी चाहिये। जहाँ पाक सिद्ध किये जाते हों, वहाँ ये सब उलूखल आदि साधन स्थापन करने चाहिये, क्योंकि इनके विना कूटना-पीसना आदि क्रिया सिद्ध नहीं हो सकती॥३॥
Subject
अब अगले मन्त्र में यह विद्या कैसे ग्रहण करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है॥