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Rigveda Mandal 1 / Sukta 27 / Mantra 9

191 Sukta
13 Mantra
1/27/9
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स वाजं॑ वि॒श्वच॑र्षणि॒रर्व॑द्भिरस्तु॒ तरु॑ता। विप्रे॑भिरस्तु॒ सनि॑ता॥

सः । वाज॑म् । वि॒श्वऽच॑र्षणिः । अर्व॑त्ऽभिः । अ॒स्तु॒ । तरु॑ता । विप्रे॑भिः । अ॒स्तु॒ । सनि॑ता ॥

Mantra without Swara
स वाजं विश्वचर्षणिरर्वद्भिरस्तु तरुता। विप्रेभिरस्तु सनिता॥

सः। वाजम्। विश्वऽचर्षणिः। अर्वत्ऽभिः। अस्तु। तरुता। विप्रेभिः। अस्तु। सनिता॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (विश्वचर्षणिः) जिसके सब मनुष्य रक्षा के योग्य (तरुता) शत्रुनिमित्तक दुःखों के पार पहुँचने-पहुँचानेवाला (सनिता) ज्ञान और सुख का विभाग करके देनेहारा सेनापति हमारी सेना में (विप्रेभिः) बुद्धिचातुर्ययुक्त पुरुष (अर्वद्भिः) घोड़े आदि से सहित हो, हमको (वाजम्) युद्ध में विजय की प्राप्ति और शत्रुओं का पराजय करने हारा सेनापति है, वही हमारे बीच में सेना स्वामी (अस्तु) हो॥९॥
Essence
जो मनुष्यों को सब दुःखरूपी सागर से पार करने और युद्ध में विजय देनेवाला विद्वान् है, वही अच्छे विद्वानों के समागम से सेना का अधिपति होने योग्य है॥९॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥