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Rigveda Mandal 1 / Sukta 27 / Mantra 6

191 Sukta
13 Mantra
1/27/6
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि॒भ॒क्तासि॑ चित्रभानो॒ सिन्धो॑रू॒र्मा उ॑पा॒क आ। स॒द्यो दा॒शुषे॑ क्षरसि॥

वि॒ऽभ॒क्ता । अ॒सि॒ । चि॒त्र॒भा॒नो॒ इति॑ चित्रऽभानो । सिन्धोः॑ । ऊ॒र्मौ । उ॒पा॒के । आ । स॒द्यः । दा॒शुषे॑ । क्ष॒र॒सि॒ ॥

Mantra without Swara
विभक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ। सद्यो दाशुषे क्षरसि॥

विऽभक्ता। असि। चित्रभानो इति चित्रऽभानो। सिन्धोः। ऊर्मौ। उपाके। आ। सद्यः। दाशुषे। क्षरसि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे हे (चित्रभानो) विविधविद्यायुक्त विद्वन् मनुष्य ! आप (सिन्धोः) समुद्र की (ऊर्मौ) तरंगों में जल के बिन्दु कणों के समान सब पदार्थ विद्या के (विभक्ता) अलग-अलग करनेवाले (असि) हैं और (दाशुषे) विद्या का ग्रहण वा अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य के लिये (उपाके) समीप सत्य बोध उपदेश को (सद्यः) शीघ्र (आक्षरसि) अच्छे प्रकार वर्षाते हो, वैसे भाग्यशाली विद्वान् आप हम सब लोगों के सत्कार के योग्य हैं॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समुद्र के जलकण अलग हुए आकाश को प्राप्त होकर वहाँ इकट्ठे होके वर्षते हैं, वैसे ही विद्वान् अपनी विद्या से सब पदार्थों का विभाग करके उनका बार-बार मनुष्यों के आत्माओं में प्रवेश किया करते हैं॥६॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥