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Rigveda Mandal 1 / Sukta 27 / Mantra 4

191 Sukta
13 Mantra
1/27/4
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒ममू॒ षु त्वम॒स्माकं॑ स॒निं गा॑य॒त्रं नव्यां॑सम्। अग्ने॑ दे॒वेषु॒ प्र वो॑चः॥

इ॒मम् । ऊँ॒ इति॑ । सु । त्वम् । अ॒स्माक॑म् । स॒निम् । गा॒य॒त्रम् । नव्यां॑सम् । अग्ने॑ । दे॒वेषु॑ । प्र । वो॒चः॒ ॥

Mantra without Swara
इममू षु त्वमस्माकं सनिं गायत्रं नव्यांसम्। अग्ने देवेषु प्र वोचः॥

इमम्। ऊँ इति। सु। त्वम्। अस्माकम्। सनिम्। गायत्रम्। नव्यांसम्। अग्ने। देवेषु। प्र। वोचः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अनन्त विद्यामय जगदीश्वर (त्वम्) सब विद्याओं का उपदेश करने और सब मङ्गलों के देनेवाले आप जैसे सृष्टि की आदि में (देवेषु) पुण्यात्मा अग्नि वायु आदित्य अङ्गिरा नामक मनुष्यों के आत्माओं में (नव्यांसम्) नवीन-नवीन बोध करानेवाला (गायत्रम्) गायत्री आदि छन्दों से युक्त (सुसनिम्) जिन में सब प्राणी सुखों का सेवन करते हैं, उन चारों वेदों का (प्रवोचः) उपदेश किया और अगले कल्प-कल्पादि में फिर भी करोगे, वैसे उसको (उ) विविध प्रकार से (अस्माकम्) हमारे आत्माओं में (सु) अच्छे प्रकार कीजिये॥४॥
Essence
हे जगदीश्वर ! आप ने जैसे ब्रह्मा आदि महर्षि धार्मिक विद्वानों के आत्माओं में वेद द्वारा सत्य बोध का प्रकाश कर उनको उत्तम सुख दिया, वैसे ही हम लोगों के आत्माओं में बोध प्रकाशित कीजिये, जिससे हम लोग विद्वान् होकर उत्तम-उत्तम धर्मकार्यों का सदा सेवन करते रहें॥
Subject
अब अगले मन्त्र में अग्नि शब्द से ईश्वर का प्रकाश किया है॥