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Rigveda Mandal 1 / Sukta 27 / Mantra 3

191 Sukta
13 Mantra
1/27/3
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स नो॑ दू॒राच्चा॒साच्च॒ नि मर्त्या॑दघा॒योः। पा॒हि सद॒मिद्वि॒श्वायुः॑॥

सः । नः॒ । दू॒रात् । च॒ । आ॒सात् । च॒ । नि । मर्त्या॑त् । अ॒घ॒ऽयोः । पा॒हि । सद॑म् । इत् । वि॒श्वऽआ॑युः ॥

Mantra without Swara
स नो दूराच्चासाच्च नि मर्त्यादघायोः। पाहि सदमिद्विश्वायुः॥

सः। नः। दूरात्। च। आसात्। च। नि। मर्त्यात्। अघऽयोः। पाहि। सदम्। इत्। विश्वऽआयुः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 3

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Meaning
(विश्वायुः) जिससे कि समस्त आयु सुख से प्राप्त होती है (सः) वह जगदीश्वर वा भौतिक अग्नि (अघायोः) जो पाप करना चाहते हैं, उन (मर्त्त्यात्) शत्रुजनों से (दूरात्) दूर वा (आसात्) समीप से (नः) हम लोगों की वा हम लोगों के (सदः) सब सुख रहनेवाले शिल्पव्यवहार वा देहादिकों की (नि) (पाहि) निरन्तर रक्षा करता है॥३॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों से उपासना किया हुआ ईश्वर वा सम्यक् सेवित विद्वान् युद्ध में शत्रुओं से रक्षा करनेवाला वा रक्षा का हेतु होकर शरीर आदि वा विमानादि की रक्षा करके हम लोगों के लिये सब आयु देता है॥३॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

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