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Rigveda Mandal 1 / Sukta 27 / Mantra 2

191 Sukta
13 Mantra
1/27/2
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स घा॑ नः सू॒नुः शव॑सा पृ॒थुप्र॑गामा सु॒शेवः॑। मी॒ढ्वाँ अ॒स्माकं॑ बभूयात्॥

सः । घ॒ । नः॒ । सू॒नुः । शव॑सा । पृ॒थुऽप्र॑गामा । सु॒ऽशेवः॑ । मी॒ढ्वान् । अ॒स्माक॑म् । ब॒भू॒या॒त् ॥

Mantra without Swara
स घा नः सूनुः शवसा पृथुप्रगामा सुशेवः। मीढ्वाँ अस्माकं बभूयात्॥

सः। घ। नः। सूनुः। शवसा। पृथुऽप्रगामा। सुऽशेवः। मीढ्वान्। अस्माकम्। बभूयात्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (सूनुः) धर्मात्मा पुत्र (शवसा) अपने पुरुषार्थ बल आदि गुण से (पृथुप्रगामा) अत्यन्त विस्तारयुक्त विमानादि रथों से उत्तम गमन करने तथा (मीढ्वान्) योग्य सुख का सींचनेवाला है, वह (नः) हम लोगों की (घ) ही उत्तम क्रिया से धर्म और शिल्प कार्यों को करनेवाला (बभूयात्) हो। इस मन्त्र में सायणाचार्य्य ने लिट् के स्थान में लिङ् लकार कहकर तिङ् को तिङ् होना यह अशुद्धता से व्याख्यान किया है, क्योंकि (तिङां तिङो भवन्तीति वक्तव्यम्) इस वार्तिक से तिङों का व्यत्यय होता है, कुछ लकारों का व्यत्यय नहीं होता है॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्या सुशिक्षा से धार्म्मिक सुशील पुत्र अनेक अपने कहे के अनुकूल कामों को करके पिता माता आदि के सुखों को नित्य सिद्ध करता है, वैसे ही बहुत गुणवाला यह भौतिक अग्नि विद्या के अनुकूल रीति से सम्प्रयुक्त किया हुआ हम लोगों के सब सुखों को सिद्ध करता है॥२॥
Subject
अब अगले मन्त्र में सन्तान के गुण प्रकाशित किये हैं॥