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Rigveda Mandal 1 / Sukta 27 / Mantra 12

191 Sukta
13 Mantra
1/27/12
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स रे॒वाँइ॑व वि॒श्पति॒र्दैव्यः॑ के॒तुः शृ॑णोतु नः। उ॒क्थैर॒ग्निर्बृ॒हद्भा॑नुः॥

सः । रे॒वान्ऽइ॑व । वि॒श्पतिः॑ । दैव्यः॑ । के॒तुः । शृ॒णो॒तु॒ । नः॒ । उ॒क्थैः । अ॒ग्निः । बृ॒हत्ऽभा॑नुः ॥

Mantra without Swara
स रेवाँइव विश्पतिर्दैव्यः केतुः शृणोतु नः। उक्थैरग्निर्बृहद्भानुः॥

सः। रेवान्ऽइव। विश्पतिः। दैव्यः। केतुः। शृणोतु। नः। उक्थैः। अग्निः। बृहत्ऽभानुः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् मनुष्य ! तुम जो (दैव्यः) देवों में कुशल (केतुः) रोग को दूर करने में हेतु (विश्पतिः) प्रजा को पालनेवाला (बृहद्भानुः) बहुत प्रकाशयुक्त (रेवान् इव) अत्यन्त धनवाले के समान (अग्निः) सबको सुख प्राप्त करनेवाला अग्नि है (उक्थैः) वेदोक्त स्तोत्रों के साथ सुना जाता है, उसको (शृणोतु) सुन और (नः) हम लोगों के लिये सुनाइये॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पूर्ण धनवाला विद्वान् मनुष्य धन भोगने योग्य पदार्थों से सब मनुष्यों को सुखसंयुक्त करता और सब की वार्त्ताओं को सुनता है, वैसे ही जगदीश्वर सबकी की हुई स्तुति को सुनकर उनको सुखसंयुक्त करता है॥१२॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥