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Rigveda Mandal 1 / Sukta 27 / Mantra 11

191 Sukta
13 Mantra
1/27/11
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स नो॑ म॒हाँ अ॑निमा॒नो धू॒मके॑तुः पुरुश्च॒न्द्रः। धि॒ये वाजा॑य हिन्वतु॥

सः । नः॑ । म॒हान् । अ॒नि॒ऽमा॒नः । धू॒मऽके॑तुः । पु॒रु॒ऽच॒न्द्रः । धि॒ये । वाजा॑य । हि॒न्व॒तु॒ ॥

Mantra without Swara
स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः। धिये वाजाय हिन्वतु॥

सः। नः। महान्। अनिऽमानः। धूमऽकेतुः। पुरुऽचन्द्रः। धिये। वाजाय। हिन्वतु॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों को योग्य है कि जो (धूमकेतुः) जिसका धूम ध्वजा के समान (पुरुश्चन्द्रः) बहुतों को आनन्द देने (अनिमानः) जिसका निमान अर्थात् परिमाण नहीं है (महान्) अत्यन्त गुणयुक्त भौतिक अग्नि है (सः) वह (धिये) उत्तम कर्म वा (वाजाय) विज्ञानरूप वेग के लिये (नः) हम लोगों को (हिन्वतु) तृप्त करता है॥११॥
Essence
जो सब प्रकार श्रेष्ठ किसी के छिन्न-भिन्न करने में नहीं आता, सब का आधार, सब आनन्द का देने वा विज्ञानसमूह परमेश्वर है और जिसने महागुणयुक्त भौतिक अग्नि रची है, वही उत्तम कर्म वा शुद्ध विज्ञान में हम लोगों को सदा प्रेरणा करे॥११॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में भौतिक अग्नि के गुण प्रकाशित किये हैं॥