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Rigveda Mandal 1 / Sukta 26 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/26/9
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- आर्च्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अथा॑ न उ॒भये॑षा॒ममृ॑त॒ मर्त्या॑नाम्। मि॒थः स॑न्तु॒ प्रश॑स्तयः॥

अथ॑ । नः॒ । उ॒भये॑षाम् । अमृ॑त । मर्त्या॑नाम् । मि॒थः । स॒न्तु॒ । प्रऽश॑स्तयः ॥

Mantra without Swara
अथा न उभयेषाममृत मर्त्यानाम्। मिथः सन्तु प्रशस्तयः॥

अथ। नः। उभयेषाम्। अमृत। मर्त्यानाम्। मिथः। सन्तु। प्रऽशस्तयः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अमृत) अविनाशिस्वरूप जगदीश्वर ! आप की कृपा से जैसे उत्तम गुण कर्मों के ग्रहण से (अथ) अनन्तर (नः) हम लोग जो कि विद्वान् वा मूर्ख हैं (उभयेषाम्) उन दोनों प्रकार के (मर्त्यानाम्) मनुष्यों की (मिथः) परस्पर संसार में (प्रशस्तयः) प्रशंसा (सन्तु) हों, वैसे सब मनुष्यों की हों, ऐसी प्रार्थना करते हैं॥९॥
Essence
जब तक मनुष्य लोग राग वा द्वेष को छोड़कर परस्पर उपकार के लिये विद्या शिक्षा और पुरुषार्थ से उत्तम-उत्तम कर्म नहीं करते, तब तक वे सुखों के सम्पादन करने को समर्थ नहीं हो सकते। इसलिये सबको योग्य है कि परमेश्वर की आज्ञा में वर्त्तमान होकर सब का कल्याण करें॥९॥
Subject
फिर किसलिये उस ईश्वर की प्रार्थना करना और मनुष्यों को परस्पर कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥