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Rigveda Mandal 1 / Sukta 26 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/26/6
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒ तना॑ दे॒वंदे॑वं॒ यजा॑महे। त्वे इद्धू॑यते ह॒विः॥

यत् । चि॒त् । हि । शश्व॑ता । तना॑ । दे॒वम्ऽदे॑वम् । यजा॑महे । त्वे इति॑ । इत् । हू॒य॒ते॒ । ह॒विः ॥

Mantra without Swara
यच्चिद्धि शश्वता तना देवंदेवं यजामहे। त्वे इद्धूयते हविः॥

यत्। चित्। हि। शश्वता। तना। देवम्ऽदेवम्। यजामहे। त्वे इति। इत्। हूयते। हविः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य लोगो ! जैसे हम लोग (यत्) जिससे ये (शश्वता) अनादि (तना) विस्तारयुक्त कारण से (इत्) ही उत्पन्न हैं, इससे उन (देवंदेवम्) विद्वान् विद्वान् और सब पृथिवी आदि दिव्यगुणवाले पदार्थ पदार्थ को (चित्) भी (यजामहे) सङ्गत अर्थात् सिद्ध करते हैं (त्वे) उसमें (हि) ही (हविः) हवन करने योग्य वस्तु (हूयते) छोड़ते हैं, वैसे तुम भी किया करो॥६॥
Essence
यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। इस संसार में जितने प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष पदार्थ हैं, वे सब अनादि अति विस्तारवाले कारण से उत्पन्न हैं, ऐसा जानना चाहिये॥६॥
Subject
फिर यज्ञ करने-करानेवाले आदि हम लोगों को क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥