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Rigveda Mandal 1 / Sukta 26 / Mantra 3

191 Sukta
10 Mantra
1/26/3
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- प्रतिष्ठागायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ हि ष्मा॑ सू॒नवे॑ पि॒तापिर्यज॑त्या॒पये॑। सखा॒ सख्ये॒ वरे॑ण्यः॥

आ । हि । स्म॒ । सू॒नवे॑ । पि॒ता । आ॒पिः । यज॑ति । आ॒पये॑ । सखा॑ । सख्ये॑ । वरे॑ण्यः ॥

Mantra without Swara
आ हि ष्मा सूनवे पितापिर्यजत्यापये। सखा सख्ये वरेण्यः॥

आ। हि। स्म। सूनवे। पिता। आपिः। यजति। आपये। सखा। सख्ये। वरेण्यः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 20 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (पिता) पालन करनेवाला (सूनवे) पुत्र के (सखा) मित्र (सख्ये) मित्र के और (आपिः) सुख देनेवाला विद्वान् (आपये) उत्तम गुण व्याप्त होने विद्यार्थी के लिये (आयजति) अच्छे प्रकार यत्न करता है, वैसे परस्पर प्रीति के साथ कार्यों को सिद्धकर (हि) निश्चय करके (स्म) वर्त्तमान में उपकार के लिये तुम सङ्गत हो॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अपने लड़कों को सुख सम्पादक उन पर कृपा करनेवाला पिता, स्वमित्रों को सुख देनेवाला मित्र और विद्यार्थियों को विद्या देनेवाला विद्वान् अनुकूल वर्त्तता है, वैसे ही सब मनुष्य सबके उपकार के लिये अच्छे प्रकार निरन्तर यत्न करें, ऐसा ईश्वर का उपदेश है॥३॥
Subject
फिर वह किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥