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Rigveda Mandal 1 / Sukta 26 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/26/2
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नि नो॒ होता॒ वरे॑ण्यः॒ सदा॑ यविष्ठ॒ मन्म॑भिः। अग्ने॑ दि॒वित्म॑ता॒ वचः॑॥

नि । नः॒ । होता॑ । वरे॑ण्यः । सदा॑ । य॒वि॒ष्ठ॒ । मन्म॑ऽभिः । अग्ने॑ । दि॒वित्म॑ता । वचः॑ ॥

Mantra without Swara
नि नो होता वरेण्यः सदा यविष्ठ मन्मभिः। अग्ने दिवित्मता वचः॥

नि। नः। होता। वरेण्यः। सदा। यविष्ठ। मन्मऽभिः। अग्ने। दिवित्मता। वचः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (यविष्ठ) अत्यन्त बलवाले (अग्ने) यजमान ! जो (मन्मभिः) जिनसे पदार्थ जाने जाते हैं, उन पुरुषार्थों के साथ वर्त्तमान (वरेण्यः) स्वीकार करने योग्य (होता) सुख देनेवाला (नः) हम लोगों के (दिवित्मता) जिनसे अत्यन्त प्रकाश होता है, उससे प्रसिद्ध (वचः) वाणी को (यज) सिद्ध करता है, उसी का (सदा) सब काल में संग करना चाहिये॥२॥
Essence
इस मन्त्र में पूर्व मन्त्र से (यज) इस पद की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को योग्य है कि सज्जन मनुष्यों के सङ्ग से सकल कामनाओं की सिद्धि करें। इसके विना कोई भी मनुष्य सुखी रहने को समर्थ नहीं हो सकता॥२॥
Subject
फिर वह किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥