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Rigveda Mandal 1 / Sukta 25 / Mantra 4

191 Sukta
21 Mantra
1/25/4
Devata- वरुणः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
परा॒ हि मे॒ विम॑न्यवः॒ पत॑न्ति॒ वस्य॑इष्टये। वयो॒ न व॑स॒तीरुप॑॥

परा॑ । हि । मे॒ । विऽम॑न्यवः । पत॑न्ति । वस्यः॑ऽइष्टये । वयः॑ । न । व॒स॒तीः । उप॑ ॥

Mantra without Swara
परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये। वयो न वसतीरुप॥

परा। हि। मे। विऽमन्यवः। पतन्ति। वस्यःऽइष्टये। वयः। न। वसतीः। उप॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 16 Mantra » 4

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Meaning
हे जगदीश्वर ! जैसे (वयः) पक्षी (वसतीः) अपने रहने के स्थानों को छोड़-छोड़ दूर देश को (उपपतन्ति) उड़ जाते हैं (न) वैसे (मे) मेरे निवास स्थान से (वस्यइष्टये) अत्यन्त धन होने के लिये (विमन्यवः) अनेक प्रकार के क्रोध करनेवाले दुष्ट जन (परापतन्ति) (हि) दूर ही चले जावें॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे उड़ाये हुए पक्षी दूर जाके बसते हैं, वैसे ही क्रोधी मुझ से दूर बसें और मैं भी उनसे दूर बसूँ, जिससे हमारा उलटा स्वभाव और धर्म की हानि कभी न होवे॥४॥
Subject
फिर भी उसी अर्थ को दृष्टान्त से अगले मन्त्र में सिद्ध किया है॥

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