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Rigveda Mandal 1 / Sukta 25 / Mantra 3

191 Sukta
21 Mantra
1/25/3
Devata- वरुणः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि मृ॑ळी॒काय॑ ते॒ मनो॑ र॒थीरश्वं॒ न संदि॑तम्। गी॒र्भिर्व॑रुण सीमहि॥

वि । मृ॒ळी॒काय॑ । ते॒ । मनः॑ । र॒थीः । अश्व॑म् । न । सम्ऽदि॑तम् । गी॒भिः । व॒रु॒ण॒ । सी॒म॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न संदितम्। गीर्भिर्वरुण सीमहि॥

वि। मृळीकाय। ते। मनः। रथीः। अश्वम्। न। सम्ऽदितम्। गीभिः। वरुण। सीमहि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 16 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वरुण) जगदीश्वर ! हम लोग (रथीः) रथवाले के (संदितम्) रथ में जोड़े हुए (अश्वम्) घोड़े के (न) समान (मृळीकाय) उत्तम सुख के लिये (ते) आपके सम्बन्ध में (गीर्भिः) पवित्र वाणियों द्वारा (मनः) ज्ञान (विषीमहि) बाँधते हैं॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे भगवन् जगदीश्वर ! जैसे रथ के स्वामी का भृत्य घोड़े को चारों ओर से बाँधता है, वैसे ही हम लोग आपका जो वेदोक्त ज्ञान है, उसको अपनी बुद्धि के अनुसार मन में दृढ़ करते हैं॥३॥
Subject
फिर भी उक्त अर्थ ही का प्रकाश अगले मन्त्र में किया है॥