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Rigveda Mandal 1 / Sukta 25 / Mantra 18

191 Sukta
21 Mantra
1/25/18
Devata- वरुणः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दर्शं॒ नु वि॒श्वद॑र्शतं॒ दर्शं॒ रथ॒मधि॒ क्षमि॑। ए॒ता जु॑षत मे॒ गिरः॑॥

दर्श॑म् । नु । वि॒श्वऽद॑र्शतम् । दर्श॑म् । रथ॑म् । अधि॑ । क्षमि॑ । ए॒ताः । जु॒ष॒त॒ । मे॒ । गिरः॑ ॥

Mantra without Swara
दर्शं नु विश्वदर्शतं दर्शं रथमधि क्षमि। एता जुषत मे गिरः॥

दर्शम्। नु। विश्वऽदर्शतम्। दर्शम्। रथम्। अधि। क्षमि। एताः। जुषत। मे। गिरः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (अधिक्षमि) जिन व्यवहारों में उत्तम और निकृष्ट बातों का सहना होता है, उनमें ठहर कर (विश्वदर्शतम्) जो कि विद्वानों की ज्ञानदृष्टि से देखने के योग्य परमेश्वर है उसको (दर्शम्) बारंबार देखने (रथम्) विमान आदि यानों को (नु) भी (दर्शम्) पुनः-पुनः देख के सिद्ध करने के लिये (मे) मेरी (गिरः) वाणियों को (जुषत) सदा सेवन करो॥१८॥
Essence
जिससे क्षमा आदि गुणों से युक्त मनुष्यों को यह जानना योग्य है कि प्रश्न और उत्तर के व्यवहार के किये विना परमेश्वर को जानने और शिल्पविद्या सिद्ध विमानादि रथों को कभी बनाने को शक्य नहीं और जो उनमें गुण हैं, वे भी इससे इनके विज्ञान होने के लिये सदैव प्रयत्न करना चाहिये॥१८॥
Subject
फिर भी वे क्या-क्या करें, इस विषय का प्रकाश अगले मन्त्र में किया है।

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