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Rigveda Mandal 1 / Sukta 25 / Mantra 10

191 Sukta
21 Mantra
1/25/10
Devata- वरुणः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhanda- प्रतिष्ठागायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नि ष॑साद धृ॒तव्र॑तो॒ वरु॑णः प॒स्त्या३॒॑स्वा। साम्रा॑ज्याय सु॒क्रतुः॑॥

नि । स॒सा॒द॒ । धृ॒तऽव्र॑तः । वरु॑णः । प॒स्त्या॑सु । आ । साम्ऽरा॑ज्याय । सु॒ऽक्रतुः॑ ॥

Mantra without Swara
नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्या३स्वा। साम्राज्याय सुक्रतुः॥

नि। ससाद। धृतऽव्रतः। वरुणः। पस्त्यासु। आ। साम्ऽराज्याय। सुऽक्रतुः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 17 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
जैसे जो (धृतव्रतः) सत्य नियम पालने (सुक्रतुः) अच्छे-अच्छे कर्म वा उत्तम बुद्धियुक्त (वरुणः) अति श्रेष्ठ सभा सेना का स्वामी (पस्त्यासु) अत्युत्तम घर आदि पदार्थों से युक्त प्रजाओं में (साम्राज्याय) चक्रवर्त्ती राज्य को करने की योग्यता से युक्त मनुष्य (आनिषसाद) अच्छे प्रकार स्थित होता है, वैसे ही हम लोगों को भी होना चाहिये॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर सब प्राणियों का उत्तम राजा है, वैसे जो ईश्वर की आज्ञा में वर्त्तमान धार्मिक शरीर और बुद्धि बलयुक्त मनुष्य हैं, वे ही उत्तम राज्य करने योग्य होते हैं॥१०॥
Subject
जो मनुष्य इस वायु को ठीक-ठीक जानता है, वह किसको प्राप्त होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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