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Rigveda Mandal 1 / Sukta 24 / Mantra 7

191 Sukta
15 Mantra
1/24/7
Devata- वरुणः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒बु॒ध्ने राजा॒ वरु॑णो॒ वन॑स्यो॒र्ध्वं स्तूपं॑ ददते पू॒तद॑क्षः। नी॒चीनाः॑ स्थुरु॒परि॑ बु॒ध्न ए॑षाम॒स्मे अ॒न्तर्निहि॑ताः के॒तवः॑ स्युः॥

अ॒बु॒ध्ने । राजा॑ । वरु॑णः । वन॑स्य । ऊ॒र्ध्वम् । स्तूप॑म् । द॒द॒ते॒ । पू॒तऽद॑क्षः । नी॒चीनाः॑ । स्थुः॒ । उ॒परि॑ । बु॒ध्नः । ए॒षा॒म् । अ॒स्मे इति॑ । अ॒न्तः । निऽहि॑ताः । के॒तवः॑ । स्यु॒रिति॑ स्युः ॥

Mantra without Swara
अबुध्ने राजा वरुणो वनस्योर्ध्वं स्तूपं ददते पूतदक्षः। नीचीनाः स्थुरुपरि बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः केतवः स्युः॥

अबुध्ने। राजा। वरुणः। वनस्य। ऊर्ध्वम्। स्तूपम्। ददते। पूतऽदक्षः। नीचीनाः। स्थुः। उपरि। बुध्नः। एषाम्। अस्मे इति। अन्तः। निऽहिताः। केतवः। स्युरिति स्युः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम जो (पूतदक्षः) पवित्र बलवाला (राजा) प्रकाशमान (वरुणः) श्रेष्ठ जलसमूह वा सूर्य्यलोक (अबुध्ने) अन्तरिक्ष से पृथक् असदृश्य बड़े आकाश में (वनस्य) जो कि व्यवहारों के सेवने योग्य संसार है, जो (ऊर्ध्वम्) उस पर (स्तूपम्) अपनी किरणों को (ददते) छोड़ता है, जिसकी (नीचीनाः) नीचे को गिरते हुए (केतवः) किरणें (एषाम्) इन संसार के पदार्थों (उपरि) पर (स्थुः) ठहरती हैं (अन्तर्हिताः) जो उनके बीच में जल और (बुध्नः) मेघादि पदार्थ (स्युः) हैं और जो (केतवः) किरणें वा प्रज्ञान (अस्मे) हम लोगों में (निहिताः) स्थिर (स्युः) होते हैं, उनको यथावत् जानो॥७॥
Essence
जिससे यह सूर्य्य रूप के न होने से अन्तरिक्ष का प्रकाश नहीं कर सकता, इससे जो ऊपरली वा बिचली किरणें हैं, वे ही मेघ की निमित्त हैं, जो उनमें जल के परमाणु रहते तो हैं, परन्तु वे अतिसूक्ष्मता के कारण दृष्टिगोचर नहीं होते। इसी प्रकार वायु अग्नि और पृथिवी आदि के भी अतिसूक्ष्म अवयव अन्तरिक्ष में रहते तो अवश्य हैं, परन्तु वे भी दृष्टिगोचर नहीं होते॥७॥
Subject
अब अगले मन्त्र में वायु और सविता के गुण प्रकाशित करते हैं-