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Rigveda Mandal 1 / Sukta 24 / Mantra 6

191 Sukta
15 Mantra
1/24/6
Devata- वरुणः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न॒हि ते॑ क्ष॒त्रं न सहो॒ न म॒न्युं वय॑श्च॒नामी प॒तय॑न्त आ॒पुः। नेमा आपो॑ अनिमि॒षं चर॑न्ती॒र्न ये वात॑स्य प्रमि॒नन्त्यभ्व॑म्॥

न॒हि । ते॒ । क्ष॒त्रम् । न । सहः॑ । न । म॒न्युम् । वयः॑ । च॒न । अ॒मी इति॑ । प॒तय॑न्तः । आ॒पुः । न । इ॒माः । आपः॑ । अ॒नि॒ऽमि॒षम् । चर॑न्तीः । न । ये । वात॑स्य । प्र॒ऽमि॒नन्ति॑ । अभ्व॑म् ॥

Mantra without Swara
नहि ते क्षत्रं न सहो न मन्युं वयश्चनामी पतयन्त आपुः। नेमा आपो अनिमिषं चरन्तीर्न ये वातस्य प्रमिनन्त्यभ्वम्॥

नहि। ते। क्षत्रम्। न। सहः। न। मन्युम्। वयः। चन। अमी इति। पतयन्तः। आपुः। न। इमाः। आपः। अनिऽमिषम्। चरन्तीः। न। ये। वातस्य। प्रऽमिनन्ति। अभ्वम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 1

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Meaning
हे जगदीश्वर ! (क्षत्रम्) अखण्ड राज्य को (पतयन्तः) इधर-उधर चलायमान होते हुए (अमी) ये लोक-लोकान्तर (न) नहीं (आपुः) व्याप्त होते हैं और न (वयः) पक्षी भी (न) नहीं (सहः) बल को (न) नहीं (मन्युम्) जो कि दुष्टों पर क्रोध है, उसको भी (न) नहीं व्याप्त होते हैं (न) नहीं ये (अनिमिषम्) निरन्तर (चरन्तीः) बहनेवाले (आपः) जल वा प्राण आपके सामर्थ्य को (प्रमिनन्ति) परिमाण कर सकते और (ये) जो (वातस्य) वायु के वेग हैं, वे भी आपकी सत्ता का परिमाण (न) नहीं कर सकते। इसी प्रकार और भी सब पदार्थ आपकी (अभ्वम्) सत्ता का निषेध भी नहीं कर सकते॥६॥
Essence
ईश्वर के अनन्त सामर्थ्य होने से उसका परिमाण वा उसकी बराबरी कोई भी नहीं कर सकता है। ये सब लोक चलते हैं, परन्तु लोकों के चलने से उनमें व्याप्त ईश्वर नहीं चलता, क्योंकि जो सब जगह पूर्ण है, वह कभी चलेगा? इस ईश्वर की उपासना को छोड़ कर किसी जीव का पूर्ण अखण्डित राज्य वा सुख कभी नहीं हो सकता। इससे सब मनुष्यों को प्रमेय वा विनाशरहित परमेश्वर की सदा उपासना करनी योग्य है॥५॥
Subject
पुनः वह ईश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

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