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Rigveda Mandal 1 / Sukta 24 / Mantra 5

191 Sukta
15 Mantra
1/24/5
Devata- सविता भगो वा Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
भग॑भक्तस्य ते व॒यमुद॑शेम॒ तवाव॑सा। मू॒र्धानं॑ रा॒य आ॒रभे॑॥

भग॑ऽभक्तस्य । ते॒ । व॒यम् । उत् । अ॒शे॒म॒ । तव॑ । अव॑सा । मू॒र्धान॑म् । रा॒यः । आ॒ऽरभे॑ ॥

Mantra without Swara
भगभक्तस्य ते वयमुदशेम तवावसा। मूर्धानं राय आरभे॥

भगऽभक्तस्य। ते। वयम्। उत्। अशेम। तव। अवसा। मूर्धानम्। रायः। आऽरभे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे जगदीश्वर ! जिससे हम लोग (भगभक्तस्य) जो सब के सेवने योग्य पदार्थों का यथा योग्य विभाग करनेवाले (ते) आपकी कीर्त्ति को (उदशेम) अत्यन्त उन्नति के साथ व्याप्त हों कि उसमें (तव) आपकी (अवसा) रक्षणादि कृपादृष्टि से (रायः) अत्यन्त धन के (मूर्द्धानम्) उत्तम से उत्तम भाग को प्राप्त होकर (आरभे) आरम्भ करने योग्य व्यवहारों में नित्य प्रवृत्त हों अर्थात् उसकी प्राप्ति के लिये नित्य प्रयत्न कर सकें॥५॥
Essence
जो मनुष्य अपने क्रिया कर्म से ईश्वर की आज्ञा में प्राप्त होते हैं, वही उससे रक्षा को सब प्रकार से प्राप्त और सब मनुष्यों में उत्तम ऐश्वर्यवाले होकर प्रशंसा को प्राप्त होते हैं, क्योंकि वही ईश्वर जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्यायव्यवस्था से विभाग कर फल देता है ॥५॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में परमेश्वर ही का प्रकाश किया है-