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Rigveda Mandal 1 / Sukta 24 / Mantra 4

191 Sukta
15 Mantra
1/24/4
Devata- सविता भगो वा Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यश्चि॒द्धि त॑ इ॒त्था भगः॑ शशमा॒नः पु॒रा नि॒दः। अ॒द्वे॒षो हस्त॑योर्द॒धे॥

यः । चि॒त् । हि । ते॒ । इ॒त्था । भगः॑ । श॒श॒मा॒नः । पु॒रा । नि॒दः । अ॒द्वे॒षः । हस्त॑योः । द॒धे ॥

Mantra without Swara
यश्चिद्धि त इत्था भगः शशमानः पुरा निदः। अद्वेषो हस्तयोर्दधे॥

यः। चित्। हि। ते। इत्था। भगः। शशमानः। पुरा। निदः। अद्वेषः। हस्तयोः। दधे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे जीव ! जैसे (अद्वेषः) सब से मित्रतापूर्वक वर्तनेवाला द्वेषादि दोषरहित मैं ईश्वर (इत्था) इस प्रकार सुख के लिये (यः) जो (शशमानः) स्तुति (भगः) और स्वीकार करने योग्य धन है, उसको (ते) तेरे धर्मात्मा के लिये (हि) निश्चय करके (हस्तयोः) हाथों में आमले का फल वैसे धर्म के साथ प्रशंसनीय धन को (दधे) धारण करता हूँ और जो (निदः) सब की निन्दा करनेहारा है, उसके लिये उस धनसमूह का विनाश कर देता हूँ, वैसे तुम लोग भी किया करो॥४॥
Essence
यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मैं ईश्वर सब के निन्दक मनुष्य के लिये दुःख और स्तुति करनेवाले के लिये सुख देता हूँ, वैसे तुम भी सदा किया करो॥४॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में परमेश्वर ने अपना ही प्रकाश किया है-