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Rigveda Mandal 1 / Sukta 24 / Mantra 3

191 Sukta
15 Mantra
1/24/3
Devata- सविता भगो वा Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒भि त्वा॑ देव सवित॒रीशा॑नं॒ वार्या॑णाम्। सदा॑वन्भा॒गमी॑महे॥

अ॒भि । त्वा॒ । दे॒व॒ । स॒वि॒तः॒ । ईशा॑नम् । वार्या॑णाम् । सदा॑ । अ॒व॒न् । भा॒गम् । ई॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
अभि त्वा देव सवितरीशानं वार्याणाम्। सदावन्भागमीमहे॥

अभि। त्वा। देव। सवितः। ईशानम्। वार्याणाम्। सदा। अवन्। भागम्। ईमहे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सवितः) पृथिवी आदि पदार्थों की उत्पत्ति वा (अवन्) रक्षा करने और (देव) सब आनन्द के देनेवाले जगदीश्वर ! हम लोग (वार्य्याणाम्) स्वीकार करने योग्य पृथिवी आदि पदार्थों की (ईशानम्) यथायोग्य व्यवस्था करने (भागम्) सब के सेवा करने योग्य (त्वा) आपको (सदा) सब काल में (अभि) (ईमहे) प्रत्यक्ष याचते हैं अर्थात् आप ही से सब पदार्थों को प्राप्त होते हैं॥३॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि जो सब का प्रकाशक सकल जगत् को उत्पन्न वा सब की रक्षा करनेवाला जगदीश्वर है, वही सब समय में उपासना करने योग्य है, क्योंकि इसको छोड़ के अन्य किसी की उपासना करके ईश्वर की उपासना का फल चाहे तो कभी नहीं हो सकता, इससे इसकी उपासना के विषय में कोई भी मनुष्य किसी दूसरे पदार्थ का स्थापन कभी न करे॥३॥
Subject
फिर वह जगदीश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-