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Rigveda Mandal 1 / Sukta 24 / Mantra 14

191 Sukta
15 Mantra
1/24/14
Devata- वरुणः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अव॑ ते॒ हेळो॑ वरुण॒ नमो॑भि॒रव॑ य॒ज्ञेभि॑रीमहे ह॒विर्भिः॑। क्षय॑न्न॒स्मभ्य॑मसुर प्रचेता॒ राज॒न्नेनां॑सि शिश्रथः कृ॒तानि॑॥

अव॑ । ते॒ । हेळः॑ । व॒रु॒ण॒ । नमः॑ऽभिः । अव॑ । य॒ज्ञेभिः॑ । ई॒म॒हे॒ । ह॒विःऽभिः॑ । क्षय॑न् । अ॒स्मभ्य॑म् । अ॒सु॒र॒ । प्र॒चे॒त॒ इति॑ प्रऽचेतः । राज॑न् । एनां॑सि । शि॒श्र॒थः॒ । कृ॒तानि॑ ॥

Mantra without Swara
अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहे हविर्भिः। क्षयन्नस्मभ्यमसुर प्रचेता राजन्नेनांसि शिश्रथः कृतानि॥

अव। ते। हेळः। वरुण। नमःऽभिः। अव। यज्ञेभिः। ईमहे। हविःऽभिः। क्षयन्। अस्मभ्यम्। असुर। प्रचेत इति प्रऽचेतः। राजन्। एनांसि। शिश्रथः। कृतानि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (राजन्) प्रकाशमान ! (प्रचेतः) अत्युत्तम विज्ञान (असुर) प्राणों में रमने (वरुण) अत्यन्त प्रशंसनीय (अस्मभ्यम्) हमको विज्ञान देनेहारे भगवन् जगदीश्वर ! जिसलिये हम लोगों के (कृतानि) किये हुए (एनांसि) पापों को (क्षयन्) विनाश करते हुए (अवशिश्रथः) विज्ञान आदि दान से उनके फलों को शिथिल अच्छे प्रकार करते हैं, इसलिये हम लोग (नमोभिः) नमस्कार वा (यज्ञेभिः) कर्म उपासना और ज्ञान और (हविर्भिः) होम करने योग्य अच्छे-अच्छे पदार्थों से (ते) आपका (हेळः) निरादर (अव) न कभी (ईमहे) करना जानते और मुख्य प्राण की भी विद्या को चाहते हैं॥१४॥
Essence
जिन मनुष्यों ने परमेश्वर के रचे हुए संसार में पदार्थ करके प्रकट किये हुए बोध से किये पाप कर्मों को फलों से शिथिल कर दिया, वैसा अनुष्ठान करें। जैसे अज्ञानी पुरुष को पापफल दुःखी करते हैं, वैसे ज्ञानी पुरुष को दुःख नहीं दे सकते॥१४॥
Subject
फिर वह वरुण कैसा है, इस का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥