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Rigveda Mandal 1 / Sukta 24 / Mantra 12

191 Sukta
15 Mantra
1/24/12
Devata- वरुणः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तदिन्नक्तं॒ तद्दिवा॒ मह्य॑माहु॒स्तद॒यं केतो॑ हृ॒द आ वि च॑ष्टे। शुनः॒शेपो॒ यमह्व॑द्गृभी॒तः सो अ॒स्मान्राजा॒ वरु॑णो मुमोक्तु॥

तत् । इत् । नक्त॑म् । तत् । दिवा॑ । मह्य॑म् । आ॒हुः॒ । तत् । अ॒यम् । केतः॑ । हृ॒दः । आ । वि । च॒ष्टे॒ । शुनः॒शेपः॑ । यम् । अह्व॑त् । गृ॒भी॒तः । सः । अ॒स्मान् । राजा॑ । वरु॑णः । मु॒मो॒क्तु॒ ॥

Mantra without Swara
तदिन्नक्तं तद्दिवा मह्यमाहुस्तदयं केतो हृद आ वि चष्टे। शुनःशेपो यमह्वद्गृभीतः सो अस्मान्राजा वरुणो मुमोक्तु॥

तत्। इत्। नक्तम्। तत्। दिवा। मह्यम्। आहुः। तत्। अयम्। केतः। हृदः। आ। वि। चष्टे। शुनःशेपः। यम्। अह्वत्। गृभीतः। सः। अस्मान्। राजा। वरुणः। मुमोक्तु॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 15 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
विद्वान् लोग (नक्तम्) रात (दिवा) दिन जिस ज्ञान का (आहुः) उपदेश करते हैं (तत्) उस और जो (मह्यम्) विद्या धन की इच्छा करनेवाले मेरे लिये (हृदः) मन के साथ आत्मा के बीच में (केतः) उत्तम बोध (आविचष्टे) सब प्रकार से सत्य प्रकाशित होता है (तदित्) उसी वेद बोध अर्थात् विज्ञान को मैं मानता कहता और करता हूँ (यम्) जिस को (शुनःशेपः) अत्यन्त ज्ञानवाले विद्याव्यवहार के लिये प्राप्त और परमेश्वर वा सूर्य्य का (अह्वत्) उपदेश करते हैं, जिससे (वरुणः) श्रेष्ठ (राजा) प्रकाशमान परमेश्वर हमारी उपासना को प्राप्त होकर छुड़ावे और उक्त सूर्य्य भी अच्छे प्रकार जाना और क्रिया कुशलता में युक्त किया हुआ बोध (मह्यम्) विद्या धन की इच्छा करनेवाले मुझ को प्राप्त होता है (सः) हम लोगों को योग्य है कि उस ईश्वर की उपासना और सूर्य्य का उपयोग यथावत् किया करें॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सब मनुष्यों को इस प्रकार उपदेश करना तथा मानना चाहिये कि विद्वान् वेद और ईश्वर हमारे लिये जिस ज्ञान का उपदेश करते हैं तथा हम जो अपनी शुद्ध बुद्धि से निश्चय करते हैं, वही मुझ को और हे मनुष्य ! तुम सब लोगों को स्वीकार करके पाप अधर्म करने से दूर रक्खा करे॥१२॥
Subject
फिर वह वरुण कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥