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Rigveda Mandal 1 / Sukta 23 / Mantra 7

191 Sukta
24 Mantra
1/23/7
Devata- इन्द्रोमरुत्वान् Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म॒रुत्व॑न्तं हवामह॒ इन्द्र॒मा सोम॑पीतये। स॒जूर्ग॒णेन॑ तृम्पतु॥

म॒रुत्व॑न्तम् । ह॒वा॒म॒हे॒ । इन्द्र॒म् । आ । सोम॑ऽपीतये । स॒ऽजूः । ग॒णेन॑ । तृ॒म्प॒तु॒ ॥

Mantra without Swara
मरुत्वन्तं हवामह इन्द्रमा सोमपीतये। सजूर्गणेन तृम्पतु॥

मरुत्वन्तम्। हवामहे। इन्द्रम्। आ। सोमऽपीतये। सऽजूः। गणेन। तृम्पतु॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 9 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्य लोगो ! जैसे इस संसार में हम लोग (सोमपीतये) पदार्थों के भोगने के लिये जिस (मरुत्वन्तम्) पवनों के सम्बन्ध से प्रसिद्ध होनेवाली (इन्द्रम्) बिजुली को (हवामहे) ग्रहण करते हैं (सजूः) जो सब पदार्थों में एकसी वर्तनेवाली (गणेन) पवनों के समूह के साथ (नः) हम लोगों को (आतृम्पतु) अच्छे प्रकार तृप्त करती है, वैसे उसको तुम लोग भी सेवन करो॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जिस सहायकारी पवन के विना अग्नि कभी प्रज्वलित होने को समर्थ और उक्त प्रकार बिजुली रूप अग्नि के विना किसी पदार्थ की बढ़ती का सम्भव नहीं हो सकता, ऐसा जानें॥७॥
Subject
अब अगले मन्त्र में वायु के सहचारी इन्द्र के गुण उपदेश किये हैं-

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