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Rigveda Mandal 1 / Sukta 23 / Mantra 6

191 Sukta
24 Mantra
1/23/6
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वरु॑णः प्रावि॒ता भु॑वन्मि॒त्रो विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑। कर॑तां नः सु॒राध॑सः॥

वरु॑णः । प्र॒ऽअ॒वि॒ता । भु॒व॒त् । मि॒त्रः । विश्वा॑भिः । ऊ॒तिऽभिः॑ । कर॑ताम् । नः॒ । सु॒ऽराध॑सः ॥

Mantra without Swara
वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः। करतां नः सुराधसः॥

वरुणः। प्रऽअविता। भुवत्। मित्रः। विश्वाभिः। ऊतिऽभिः। करताम्। नः। सुऽराधसः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 9 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे यह अच्छे प्रकार सेवन किया हुआ (वरुणः) बाहर वा भीतर रहनेवाला वायु (विश्वाभिः) सब (ऊतिभिः) रक्षा आदि निमित्तों से सब प्राणि या पदार्थों को करके (प्राविता) सुख प्राप्त करनेवाला (भुवत्) होता है (मित्रश्च) और सूर्य्य भी जो (नः) हम लोगों को (सुराधसः) सुन्दर विद्या और चक्रवर्त्ति राज्यसम्बन्धी धनयुक्त (करताम्) करते हैं, जैसे विद्वान् लोग इन से बहुत कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे हम लोग भी इसी प्रकार इन का सेवन क्यों न करें॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिसलिये इन उक्त वायु और सूर्य के आश्रय करके सब पदार्थों के रक्षा आदि व्यवहार सिद्ध होते हैं, इसलिये विद्वान् लोग भी इनसे बहुत कार्य्यों को सिद्ध करके उत्तम-उत्तम धनों को प्राप्त होते हैं॥६॥
Subject
फिर वे क्या करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-