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Rigveda Mandal 1 / Sukta 23 / Mantra 5

191 Sukta
24 Mantra
1/23/5
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ॒तेन॒ यावृ॑ता॒वृधा॑वृ॒तस्य॒ ज्योति॑ष॒स्पती॑। ता मि॒त्रावरु॑णा हुवे॥

ऋ॒तेन॑ । यौ । ऋ॒त॒ऽवृधौ॑ । ऋ॒तस्य॑ । ज्योति॑षः । पती॒ इति॑ । ता । मि॒त्रावरु॑णा । हु॒वे॒ ॥

Mantra without Swara
ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती। ता मित्रावरुणा हुवे॥

ऋतेन। यौ। ऋतऽवृधौ। ऋतस्य। ज्योतिषः। पती इति। ता। मित्रावरुणा। हुवे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
मैं (यौ) जो (ऋतेन) परमेश्वर ने उत्पन्न करके धारण किये हुए (ऋतावृधौ) जल को बढ़ाने और (ऋतस्य) यथार्थ स्वरूप (ज्योतिषः) प्रकाश के (पती) पालन करनेवाले (मित्रावरुणौ) सूर्य और वायु हैं, उनको (हुवे) ग्रहण करता हूँ॥५॥
Essence
न सूर्य और वायु के विना जल और ज्योति अर्थात् प्रकाश की योग्यता, न ईश्वर के उत्पादन किये विना सूर्य्य और वायु की उत्पत्ति का सम्भव और न इनके विना मनुष्यों के व्यवहारों की सिद्धि हो सकती है॥५॥
Subject
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-