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Rigveda Mandal 1 / Sukta 23 / Mantra 4

191 Sukta
24 Mantra
1/23/4
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मि॒त्रं व॒यं ह॑वामहे॒ वरु॑णं॒ सोम॑पीतये। ज॒ज्ञा॒ना पू॒तद॑क्षसा॥

मि॒त्रम् । व॒यम् । ह॒वा॒म॒हे॒ । वरु॑णम् । सोम॑ऽपीतये । ज॒ज्ञा॒ना । पू॒तऽद॑क्षसा ॥

Mantra without Swara
मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये। जज्ञाना पूतदक्षसा॥

मित्रम्। वयम्। हवामहे। वरुणम्। सोमऽपीतये। जज्ञाना। पूतऽदक्षसा॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(वयम्) हम पुरुषार्थी लोग जो (सोमपीतये) जिसमें सोम अर्थात् अपने अनुकूल सुखों को देनेवाले रसयुक्त पदार्थों का पान होता है, उस व्यवहार के लिये (पूतदक्षसा) पवित्र बल करनेवाले (जज्ञाना) विज्ञान के हेतु (मित्रम्) जीवन के निमित्त बाहर वा भीतर रहनेवाले प्राण और (वरुणम्) जो श्वासरूप ऊपर को आता है, उस बल को करनेवाले उदान वायु को (हवामहे) ग्रहण करते हैं, उनको तुम लोगों को भी क्यों न जानना चाहिये॥४॥
Essence
मनुष्यों को प्राण और उदान वायु के विना सुखों का भोग और बल का सम्भव कभी नहीं हो सकता, इस हेतु से इनके सेवन की विद्या को ठीक-ठीक जानना चाहिये॥४॥
Subject
इस विद्या के प्राप्त करानेवाले प्राण और उदान हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-